मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

पानी की गाड़ी

एक बार देश में बिजली का उत्पादन कम हुआ. सरकार ने पूरे देश में बिजली की भारी कटौती की. देश के प्रमुख बाँध भाखड़ानागल पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. बेचारे का जगह-जगह से पलस्तर उखड़ने लगा. दरारें पड़ने लगीं. क्योंकि वह अधिक बिजली पैदा करके नहीं दे रहा था इसलिए सरकार ने उसकी उपेक्षा करना शुरू कर दिया.

बाँध ने सोचा अगर उसमें पानी लबालब भर जाए तो वह भी पहले की तरह बिजली ज्यादा पैदा कर पायेगा. सरकार भी उस पर ध्यान देगी. इसलिए उसने अपनी नदी से कहा कि मुझे अधिक पानी चाहिए. तुम मुझे बहुत कम पानी दे रही हो. अब मैं कम बिजली बना पाता हूँ. मुझे सब गुस्से से देखने लगे हैं कृपयाकर मुझे जल्दी से जल्दी अधिक पानी दो.

नदी ने कहा — मैं विवश हूँ. मैं चाह कर भी तुम्हें अधिक पानी नहीं दे सकती. क्योंकि इस बार बारिश नहीं हुयी. और ना ही मुझे हिमालयराज ने अपने राजकोष से कुछ जलराशि दी है. मैं तुम्हारी बात लेकर हिमालयराज के पास जाऊँगी और उनसे विनती करूँगी कि वे हमारी खुशहाली और समृद्धी हमें लौटा दें.

नदी ने जाकर पर्वतराज हिमालय से कहा — राजन! पानी की कमी से मैं बहुत पतली हो गयी हूँ.  और बाँध भी खाली पेट दिन गुजार रहा है. आप कृपाकर हमारी खुशहाली का समाधान करें.

हिमालयराज ने कहा — क्या करूँ देवी! इस विकट स्थिति [समस्या] से मैं बहुत दुखी हूँ. बार-बार अपने वृक्ष सेवकों से सन्देश भेजता हूँ लेकिन भगवान् जलनिधि तक नहीं पहुँच पाता. बीच में मनुष्यकृत फैले प्रदूषण से रुक जाता है. मैं फिर से एक बार तुम्हारे सामने ही प्रयास करता हूँ, देखो!

हिमालय ने देवदार और चीड नामक अपने सेवकों से सन्देश प्रेषण के लिए फिर प्रयास करने को कहा. देवदार और चीड़ के वृक्षों ने अपनी शाखाओं से वायु में तरंगों को छोड़ा जिसमें पानी की किल्लत की बात कही गई और जलनिधि से यथाशीघ्र जल की गाड़ियाँ भेजने को कहा गया.

वायु ने तरह-तरह के प्रदूषणों को लाँघते हुए जैसे-तैसे तरंग सन्देश जलनिधि के पास पहुँचाया. जलनिधि ने तुरंत वारिवाह नामक मेघ को पानी की गाड़ी लेकर रवाना किया.

वारिवाह ने अपनी पानी की गाड़ी को बहुत तेज़ दौडाया.  रास्ता लंबा था इसलिए कभी-कभी वह अपनी चाल धीमी भी कर लेता. चलते-चलते एक स्थान पर उसने प्यासा जंगल देखा, जो प्यास से अधमरा हो गया था. वारिवाह ने जंगल की आर्त पुकार पर उसे अपनी गाड़ी से काफी सारा पानी पिलाया. जंगल खुश हो गया. जंगल ने पानी की गाड़ी के मालिक वारिवाह को धन्यवाद दिया.

वारिवाह अपनी पानी की गाड़ी को लेकर आगे बढ़ गया. रास्ते में सूखे से ग्रस्त धरती को देखकर उसने थोड़ा पानी वहाँ भी बरसा दिया. धरती में जान आ गयी. उसने वारिवाह को प्रेम से देखा और अपनी सुगंध से सबको खुश कर दिया.

पानी की गाड़ी आगे बढ़ी तो कुछ किसानों ने उसकी तरफ आशा से निहारा. उनकी फसल को पानी चाहिए था इसलिए उन्होंने हाथ जोड़कर वारिवाह से प्रार्थना की कि थोड़ा पानी उनकी फसलों पर बरसा दें तो छोटे-छोटे पौधों की जान बच जायेगी.

वारिवाह ने देखा कि पानी कि गाड़ी आधी खाली हो गयी है. उसने फिर भी बिना हिचक सभी किसानों की फसलों पर पानी बरसा दिया. किसान खुशी से नाच उठे. फसलों के छोटे-छोटे पौधे ख़ुशी से झूम उठे.

वारिवाह मंजिल पर पहुँचने ही वाले थे तभी रास्ते में एक तालाब दिखा जिसके जीव-जंतु बिना पानी के मर रहे थे. पानी में रहने वाली मछलियाँ, मेंढ़क और तालाब के किनारे बसने वाले पशु-पक्षी सब-के-सब दम तोड़ रहे थे. वारिवाह ने अपनी गाड़ी का सारा पानी उस तालाब में उड़ेल दिया. तालाब पानी से भरते ही अधमरे जीवों में फिर से जान आ गयी. सभी जीव-जंतुओं ने किलकारियाँ भरीं और सभी ने मुँह उठाकर वारिवाह को प्रणाम किया.

लेकिन वारिवाह जब पर्वतराज हिमालय के पास पहुँचे तब तक पूरे खाली हो चुके थे. राजन ने कहा — तुम खाली चले आये. ऐसा क्यों? वारिवाह ने रास्ते की पूरी घटना पर्वतराज से कही. तब पर्वतराज बोले — कोई बात नहीं. यह तो अच्छी बात है कि जो पहला जरूरतमंद मिले मदद पहले उसकी ही की जानी चाहिए, बाद में बाकियों की. तुम्हारी दूसरी गाड़ियाँ कब तक आ जायेंगी? हम प्रतीक्षा करेंगे.

[सीख — पाठकगण इस कहानी से मिली सीख को मेरे भिक्षा-पात्र में कृपया भेजें. ]

1 टिप्पणी:

महामूर्खराज ने कहा…

vaah mitra adbhut
sikh- 1. aao pryavaran ko bachayen.
2. yogyata ke adhar par sansadhan ka vitran chahe wo pani ho, nukari ho, dhan ka daan ho,

yogyata mahatavpurn hai.

http://raamkahaani.blogspot.com/

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