गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

जब जागो तभी सवेरा

जब तक प्रकृति की अन्य कहानियाँ जन्म लें तब तक मनुष्य समाज की सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानियाँ सुनें —

एक बड़े संत की एक बड़ी भक्तन थीं — बड़ी धार्मिक बड़ी कर्मकांडी. एक बड़े परिवार के मुखिया की मुखनी थीं. नाम था सूर्यमुखी. संत ने गुरुमंत्र देकर पूरे परिवार को दीक्षित किया था. सभी के गले में लटकते लॉकेटों से प्रतीत होता कि यह भी शरीर का ही अवयव है. नवजात शिशु के गले में भी जब वही लौकेट देखा तो लगा कर्ण के कवच-कुंडल की भाँति यह बालक भी अपने साथ लौकेट लेकर पैदा हुआ है.
प्रातः सूर्य के एक बाँस ऊपर आ जाने के बाद से ही दिनचर्या का प्रारम्भ होता — लगभग सात-आठ बजे से.

घूमने का शौक उनके परिवार को एक दिन भारत के पूर्वी छोर पर ले गया. सभी प्राकृतिक छटा का भरपूर आनंद लेते हुए गए. अगली प्रातः को जब सूर्यमुखी की नींद खुली तो सूर्य पूरा निकल आया था लेकिन घड़ी अब भी चार बजा रही थी. सभी बच्चों की नींद खुलने लगी थी. विधाता की लीला जान वह उन्हें किसी चमत्कार से कम ना लगा. सो सभी बच्चों को फिर से सो जाने का आदेश किया कि अभी तो सुबह के सात बजने में काफी देर है.

उन्हें शायद ज्ञात नहीं था कि जैसे-जैसे पृथ्वी के पूर्व में जायेंगे तो घड़ी समय से आगे होती जायेगी अथवा सूर्य का निकलना क्रमतर पहले होता जाएगा.

अतः "जब जागो तभी सवेरा"

[शिक्षा : देश-काल-वातावरण के अनुकूल अपनी क्रियाओं में फेर-बदल करना चाहिए. ]

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