बुधवार, 28 अप्रैल 2010

खेलगाँव के पिछवाड़े पौधकुमार का जन्म

पिछले साल की ही बात है, दिल्ली के अक्षरधाम के पिछवाड़े जो खेलगाँव बसने जा रहा है वहाँ पर, उसी भूमि पर एक पौधे का पुनर्जन्म हुआ. इस जन्म में उसे नीम की योनी प्राप्त हुई. आसपास के वृक्षों ने उसे खूब प्यार किया. उसके पालन-पोषण का दायित्व और शिक्षा का उचित प्रबंध किया. वृक्ष-समुदाय में लार्ड मेकाले की शिक्षा-नीति के अनुसार शिक्षा नहीं दी जाती, वहाँ परोपकारिक-शिक्षा नीति के अनुसार सभी वनस्पतियाँ बिना ऊँच-नीच, बिना जाति-पाति, बिना भेद-भाव के शिक्षा गृहण करती हैं. पौधकुमार बचपन से काफी होनहार थे, उनके चिकने पत्ते इसका प्रमाण थे. कहते भी हैं कि "होनहार बिरवान के होत चीकने पात". शीशम तरु ने पौधकुमार को अपने आस-पास रहने वाले पेड़-पौधों के नाम और संबोधनों की जानकारी दी.

जैसे "अ-ल...ल..लला...ला.! इधर देखो, ये तुम्हारे जामुन अंकल हैं..., और ये तुम्हारी इमली चाची... और मैं तुम्हारा शीशम ता..ऊ.    ताऊ जी को ताऊ बोलो.. देखो हँस दिया."



उसकी माँ यमुना किनारे किसी तरह अपने कुनबे को बचाए खड़ी थी. वहाँ आने-जाने वाले हर थके-मांदे जीव-जंतुओं को अपनी छाया, आश्रय देकर उनकी सेवा में दिन-रात लगी रहती और अपने वृक्ष-जीवन को सफल कर रही थी. बढ़ती आयु में जहाँ लोग अपना समय प्रभु-भक्ति के नाम पर व्यर्थ करते हैं वहीँ वह अपना समय परोपकार में लगाए थी, जिसे वह ईश्वर आराधना से कमतर नहीं आँकती थी.



पौधकुमार के समीप उनके गुरुजन सदा उसकी बाल-जिज्ञासाओं को अपने उत्तरों से शांत करते रहते. बालकों के सवालों के उत्तर यदि सुलझे हुए दिए जाएँ तो यही उत्तर उनके संस्कारों की भूमि तैयार करते हैं. संस्कार अलग दी जाने वाली कोई दवाई या बूटी नहीं है और ना ही कोई शिक्षा है जिसे किसी आयु विशेष का इंतज़ार रहता है. सभी आस-पास के यार-दोस्त उस पौधकुमार को "नीमन" नाम से पुकारते हैं. हालाँकि अब वह किशोर होकर अपने हाथ-पाँव फैलाने की तैयारी में लगा है. जिसके बारे में आगे किसी कहानी में बयान किया जाएगा. अभी तो उसके पहले वर्ष की जीवन की झाँकी देख ली जाए.



एक बार की बात है, जब उसकी गर्दन कुछ ऊँचा उठनी शुरू हुई तो उसे दिखने वाली हर वस्तु आकर्षित करने लगी और उसके बारे में उसने अपने समीपस्थ पालकों [गुरु वृक्षों] के सामने सवालों की झड़ी लगानी शुरू कर दी.

नीमन पूछता — जामुन अंकल! वो क्या है?
जामुन — वो बेटा! सफेदे का पेड़ है.
नीमन — अंकल! वो क्या है?
जामुन — वो बेटा! कीकर का पेड़ है.
नीमन — अंकल! वो क्या है?
जामुन — वो बेटा! नीम का पेड़ है? तुम्हारे वे दूर के दादाजी हैं. अब काफी बूढ़े हो चले हैं.
नीमन — मेरे दूर के दादा जी, मुझसे इतनी दूर क्यों खड़े हैं?
जामुन — बेटा! हमारे लिए दूर-पास कोई मायने नहीं रखता. हम पास रहें या दूर, एक सा ही व्यवहार करते हैं. देखो वे तुम्हारी तरफ प्यार से देख रहे हैं. उन्हें प्रणाम करो. 'कहो दादाजी नमस्ते!'
नीमन — [जोर से] दादाजी... नमस्ते!
जामुन — तुम धीरे से भी बोलोगे तो वे तब भी तुम्हारी आवाज सुन लेंगे.
नीमन — [एक बिजली के खम्बे की तरफ इशारा करके] अच्छा अंकल! वो कौन-सा पेड़ है?
जामुन — बेटा, वो, सड़क के पार वाला.... वो पेड़ नहीं हैं, वो तो आदमी द्वारा खड़े किये पोल भाईसाहब हैं. जो रात को रोशनी करने का काम करते हैं. वहाँ कभी.... आपके परिवार के कई मौसियाँ, मामा आदि हुआ करते थे. अब वे नहीं रहे.
नीमन — मेरे मामा, मौसी? अब वे कहाँ गए?
जामुन — बेटा, वे अपने पुनर्जन्म के इन्तजार में हैं. कुछ महीनों पहले ही तो उनकी सामुहिक ह्त्या कर दी गयी. बेटा तुम नहीं समझोगे. अभी तुम छोटे हो. इस बारे में कभी और बताउंगा.

नीमन —  अंकल, वो लंबा पेड़ कौन-सा है?
जामुन — बेटा, वो पेड़ नहीं है, वो आपार्टमेंट है. [जामुन की आँखों में आँसू भर आते हैं] वहीँ तो तुम्हारे ...[फफक-फफक कर रोने लगता है] ... वहीँ तो तुम्हारे दादाजी का बगीचा हुआ करता था. "वैद्यराज नीम की वाटिका" नाम था, उसे उजाड़ कर ही तो खेलगाँव बसाया जा रहा है. जहाँ आदमियों के क्वालिफाइड बच्चे रहेंगे. बेटा मत पूछो, फिर कभी बताउंगा तुम्हारे दादाजी के बगीचे के बारे में.
नीमन — अच्छा अंकल आप रोना नहीं. बस उस मोटे पेड़ के बारे में और बता दो? क्या वो पेड़ नहीं, अपार्टमेन्ट है या फिर कुछ और है?
जामुन — बेटा, तुम बहुत अच्छे हो, कम-से-कम मेरा रोना तुम्हें दिखाई देता है. बेटा, वो मोटा-मोटा पेड़ नहीं और ना ही कोई अपार्टमेन्ट है. वो तो आदमियों के धर्म और आस्था का केंद्र अक्षरधाम मंदिर है. जहाँ लोग अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं और परोपकार करने के झूठे संकल्प करते हैं. ये सब एक-दूसरे की देखा-देखी, सामाजिक प्रदर्शन करते हैं कि वो आस्तिक हैं, ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं. ये आदमियों की जीवन शैली है हमारी नहीं. हमारे जीवन का उद्देश्य तो सभी का परोपकार है. चाहे वो हमारी वृक्ष जाति हो अथवा मनुष्य जाति हो अथवा अन्य कोई भी प्राणियों का वर्ग हो हम बिना भेद-भाव के छाया, फल, आश्रय, औषधि, आदि देते हैं. अब काफी समय हो गया बेटा तुम जमीन से कुछ पानी-खुराकी खींचो और अपने तने में पहुँचाओ. तुम्हारा हलक सूख रहा है.
नीमन की आँखे बंद होने लगती हैं. शायद उसे नींद आ रही है. पहले थोड़ा सो ले फिर उसके सवालों की बौछार फिर शुरू हो जायेगी. तब तक हम विश्राम लेते हैं. विदा.


[शेष अगले अंक में]
इस कहानी को लिखते हुए मेरे एक स्थान पर स्वयं आँसू आ गए. मैं इस रोने को उन वृक्षों को श्रद्धांजलि रूप में अर्पित करता हूँ जो अब विकास प्रक्रिया की भेंट चढ़ चुके हैं. यही है मेरा बलि-वैश्य यज्ञ.

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

ज्योतिषी पंडित पीपल प्रसाद जी का रत्नज्ञान

एक गाँव में चौपाल के पास एक बहुत विशालकाय वृक्ष खडा था. नाम था पंडित पीपल प्रसाद जो कभी पुराने पेड़ों के बीच पंडित लाल धागे वाले के नाम से मशहूर हुआ करते थे. नयी पीढ़ी नयी सोच के लोगों में आज अपनी अहमियत कम होता देख पंडित जी ने फिर से उसी ५० साल पुरानी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए काफी चिंतन किया और मन-ही-मन एक योजना बना डाली.

पंडित जी ने अपनी छाँह तले एक साइकिल-दुकान को आश्रय दिया हुआ था. जो पेड़ अपनी जवानी में लोगों के अधूरे अरमानों को पूरा करने वास्ते कभी लाल धागों से लिपटा रहता था आज समय के फेर ने उसे अपनी शाखाओं में स्कूटर-साइकिल के टायर-ट्यूब पहनने को मजबूर कर दिया था. लेकिन पंडित जी हर स्थिति को अपने अनुकूल बनाने में सिद्धहस्त थे. उन्होंने इसे रत्नों की महिमा के गुणगान में प्रयोग किया.

"पहले मैं नर्वस रहता था. मन में सदा घबराहट बनी रहती थी. भाग्य के कपाट बंद थे. कोई पक्षी मुझ पर बसेरा करने को राजी ना था. तने पर कुत्ते मूतते थे, डालों पर गिद्ध बैठते थे. उल्लू कोटर बनाने को उतावले दीखते थे. लेकिन अब... अब बिलकुल ऐसा नहीं है."

"जिसके तने में जितनी ज़्यादा मोची कीलें ठुकीं हों वह उतना ही आत्म-विश्वास से भरा रहता है. साइन बोर्ड वाले वृक्षों का हाजमा सही रहता है और टायर-ट्यूब पहनने वाले वृक्ष तो सदा संत-स्वभावी होते हैं, उनपर कभी दुष्ट शनि [लकडहारे] की वक्र दृष्टि नहीं पड़ती."

"और यदि किसी  पेड़ को रात में 'आदम बच्चों को झूला झुलाने के' सपने आते हों तो वे अपनी सबसे निचली शाखा में दो मोटर-साइकिल के टायर पहनें. इससे सपने आना बंद हो जायेंगे. आदम बच्चे पास आकर खड़े होने लगेंगे."

"और यदि कोई पेड़ अपने छरहरे होने के बावजूद किसी लतिका को सहारा देने की इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा है तो वह दिन में दो बारी अपनी शाखाओं पर जंगली कौवों को बैठा कर नीचे निकलते श्वेतवस्त्रधारी राहगीरों पर बीट से अर्घ्य दिलवायें. मनोकामना शीघ्र पूरी होगी."

पंडित जी आसपास बसे घरों के छज्जों से झाँक रहे गमल-गुल्मों को भी प्यार से देखते थे और उनको उनकी "थोड़ी मिट्टी, थोड़ा पानी" वाली किस्मत पर धीरज रखने को कहते. उन्हें कहते "तुम यदि तुलसी गमले पर सुबह-शाम जलने वाले दीपक का कार्बन-प्रसाद ग्रहण कर पाओ तो वह तुम्हारे उद्धार में सहायक होगा. "

इस तरह पंडित पीपल प्रसाद धीरे-धीरे वृक्ष-समाज में अपनी जगह बनाने लगे.



शेष अगले अंक में...

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

पानी की गाड़ी

एक बार देश में बिजली का उत्पादन कम हुआ. सरकार ने पूरे देश में बिजली की भारी कटौती की. देश के प्रमुख बाँध भाखड़ानागल पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. बेचारे का जगह-जगह से पलस्तर उखड़ने लगा. दरारें पड़ने लगीं. क्योंकि वह अधिक बिजली पैदा करके नहीं दे रहा था इसलिए सरकार ने उसकी उपेक्षा करना शुरू कर दिया.

बाँध ने सोचा अगर उसमें पानी लबालब भर जाए तो वह भी पहले की तरह बिजली ज्यादा पैदा कर पायेगा. सरकार भी उस पर ध्यान देगी. इसलिए उसने अपनी नदी से कहा कि मुझे अधिक पानी चाहिए. तुम मुझे बहुत कम पानी दे रही हो. अब मैं कम बिजली बना पाता हूँ. मुझे सब गुस्से से देखने लगे हैं कृपयाकर मुझे जल्दी से जल्दी अधिक पानी दो.

नदी ने कहा — मैं विवश हूँ. मैं चाह कर भी तुम्हें अधिक पानी नहीं दे सकती. क्योंकि इस बार बारिश नहीं हुयी. और ना ही मुझे हिमालयराज ने अपने राजकोष से कुछ जलराशि दी है. मैं तुम्हारी बात लेकर हिमालयराज के पास जाऊँगी और उनसे विनती करूँगी कि वे हमारी खुशहाली और समृद्धी हमें लौटा दें.

नदी ने जाकर पर्वतराज हिमालय से कहा — राजन! पानी की कमी से मैं बहुत पतली हो गयी हूँ.  और बाँध भी खाली पेट दिन गुजार रहा है. आप कृपाकर हमारी खुशहाली का समाधान करें.

हिमालयराज ने कहा — क्या करूँ देवी! इस विकट स्थिति [समस्या] से मैं बहुत दुखी हूँ. बार-बार अपने वृक्ष सेवकों से सन्देश भेजता हूँ लेकिन भगवान् जलनिधि तक नहीं पहुँच पाता. बीच में मनुष्यकृत फैले प्रदूषण से रुक जाता है. मैं फिर से एक बार तुम्हारे सामने ही प्रयास करता हूँ, देखो!

हिमालय ने देवदार और चीड नामक अपने सेवकों से सन्देश प्रेषण के लिए फिर प्रयास करने को कहा. देवदार और चीड़ के वृक्षों ने अपनी शाखाओं से वायु में तरंगों को छोड़ा जिसमें पानी की किल्लत की बात कही गई और जलनिधि से यथाशीघ्र जल की गाड़ियाँ भेजने को कहा गया.

वायु ने तरह-तरह के प्रदूषणों को लाँघते हुए जैसे-तैसे तरंग सन्देश जलनिधि के पास पहुँचाया. जलनिधि ने तुरंत वारिवाह नामक मेघ को पानी की गाड़ी लेकर रवाना किया.

वारिवाह ने अपनी पानी की गाड़ी को बहुत तेज़ दौडाया.  रास्ता लंबा था इसलिए कभी-कभी वह अपनी चाल धीमी भी कर लेता. चलते-चलते एक स्थान पर उसने प्यासा जंगल देखा, जो प्यास से अधमरा हो गया था. वारिवाह ने जंगल की आर्त पुकार पर उसे अपनी गाड़ी से काफी सारा पानी पिलाया. जंगल खुश हो गया. जंगल ने पानी की गाड़ी के मालिक वारिवाह को धन्यवाद दिया.

वारिवाह अपनी पानी की गाड़ी को लेकर आगे बढ़ गया. रास्ते में सूखे से ग्रस्त धरती को देखकर उसने थोड़ा पानी वहाँ भी बरसा दिया. धरती में जान आ गयी. उसने वारिवाह को प्रेम से देखा और अपनी सुगंध से सबको खुश कर दिया.

पानी की गाड़ी आगे बढ़ी तो कुछ किसानों ने उसकी तरफ आशा से निहारा. उनकी फसल को पानी चाहिए था इसलिए उन्होंने हाथ जोड़कर वारिवाह से प्रार्थना की कि थोड़ा पानी उनकी फसलों पर बरसा दें तो छोटे-छोटे पौधों की जान बच जायेगी.

वारिवाह ने देखा कि पानी कि गाड़ी आधी खाली हो गयी है. उसने फिर भी बिना हिचक सभी किसानों की फसलों पर पानी बरसा दिया. किसान खुशी से नाच उठे. फसलों के छोटे-छोटे पौधे ख़ुशी से झूम उठे.

वारिवाह मंजिल पर पहुँचने ही वाले थे तभी रास्ते में एक तालाब दिखा जिसके जीव-जंतु बिना पानी के मर रहे थे. पानी में रहने वाली मछलियाँ, मेंढ़क और तालाब के किनारे बसने वाले पशु-पक्षी सब-के-सब दम तोड़ रहे थे. वारिवाह ने अपनी गाड़ी का सारा पानी उस तालाब में उड़ेल दिया. तालाब पानी से भरते ही अधमरे जीवों में फिर से जान आ गयी. सभी जीव-जंतुओं ने किलकारियाँ भरीं और सभी ने मुँह उठाकर वारिवाह को प्रणाम किया.

लेकिन वारिवाह जब पर्वतराज हिमालय के पास पहुँचे तब तक पूरे खाली हो चुके थे. राजन ने कहा — तुम खाली चले आये. ऐसा क्यों? वारिवाह ने रास्ते की पूरी घटना पर्वतराज से कही. तब पर्वतराज बोले — कोई बात नहीं. यह तो अच्छी बात है कि जो पहला जरूरतमंद मिले मदद पहले उसकी ही की जानी चाहिए, बाद में बाकियों की. तुम्हारी दूसरी गाड़ियाँ कब तक आ जायेंगी? हम प्रतीक्षा करेंगे.

[सीख — पाठकगण इस कहानी से मिली सीख को मेरे भिक्षा-पात्र में कृपया भेजें. ]

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

जब जागो तभी सवेरा

जब तक प्रकृति की अन्य कहानियाँ जन्म लें तब तक मनुष्य समाज की सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानियाँ सुनें —

एक बड़े संत की एक बड़ी भक्तन थीं — बड़ी धार्मिक बड़ी कर्मकांडी. एक बड़े परिवार के मुखिया की मुखनी थीं. नाम था सूर्यमुखी. संत ने गुरुमंत्र देकर पूरे परिवार को दीक्षित किया था. सभी के गले में लटकते लॉकेटों से प्रतीत होता कि यह भी शरीर का ही अवयव है. नवजात शिशु के गले में भी जब वही लौकेट देखा तो लगा कर्ण के कवच-कुंडल की भाँति यह बालक भी अपने साथ लौकेट लेकर पैदा हुआ है.
प्रातः सूर्य के एक बाँस ऊपर आ जाने के बाद से ही दिनचर्या का प्रारम्भ होता — लगभग सात-आठ बजे से.

घूमने का शौक उनके परिवार को एक दिन भारत के पूर्वी छोर पर ले गया. सभी प्राकृतिक छटा का भरपूर आनंद लेते हुए गए. अगली प्रातः को जब सूर्यमुखी की नींद खुली तो सूर्य पूरा निकल आया था लेकिन घड़ी अब भी चार बजा रही थी. सभी बच्चों की नींद खुलने लगी थी. विधाता की लीला जान वह उन्हें किसी चमत्कार से कम ना लगा. सो सभी बच्चों को फिर से सो जाने का आदेश किया कि अभी तो सुबह के सात बजने में काफी देर है.

उन्हें शायद ज्ञात नहीं था कि जैसे-जैसे पृथ्वी के पूर्व में जायेंगे तो घड़ी समय से आगे होती जायेगी अथवा सूर्य का निकलना क्रमतर पहले होता जाएगा.

अतः "जब जागो तभी सवेरा"

[शिक्षा : देश-काल-वातावरण के अनुकूल अपनी क्रियाओं में फेर-बदल करना चाहिए. ]

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

प्राकृतिक जीवन सहज है...

हिमालय पर एक संत रहते थे. प्रकृति से प्रेम था. वर्षों से विभिन्न विषयों पर शोध जारी था. नदी-नाले, पेड़-पौधे, पहाड़-झरने और जलचर-नभचर-थलचर के सभी जीवों के व्यवहारों का गूढता से निरीक्षण करना उनका रुचि का विषय था. जीवों के व्यवहारों पर चिंतन करते हुए उनके अंतःकरण में परमात्मा के प्रति आस्था बढ़ती गयी.
सभी प्राणी बिना अवरोध जी रहे हैं. सभी को सब प्रकार का सुख है. जिसके चरण नहीं वह बिन चरणों के ही तीव्रता से रेंग लेता है. जिसके चरणों में गति नहीं वह भी पंखों से आकाश नापकर इच्छित स्थान पर आता-जाता है. दाँत, नाखून, मुखाकृति, पाचन-तंत्र आदि शरीरावयव सभी प्राणियों को उनकी आवश्यकतानुसार ही मिले हैं.
ढूँढने से भी नहीं मिला उन्हें कोई अभावग्रस्त. उन्होंने मनुष्यों में भी ऐसा ही पाया लेकिन रो वही रहे थे, दुखी वही थे जिनकी इच्छाएँ अनावश्यक रूप से विकास किये थीं.
निष्कर्षतः प्राकृतिक जीवन सहज है यदि इच्छाएँ सीमित हैं.

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बरगद शाखी

सड़क किनारे लगे बिजली के पोल ने निराश खड़े बिना नाम वाले पेड़ को कहा — "भैया, उदास क्यों हो! तुम भी बरगद की तरह आदम समाज में सम्मान पा सकते हो. इसके लिए तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ. समाज में ऐसे कई वृक्ष हैं जो महान होने और वरिष्ठता का ढ़ोंग करते हैं. तुम भी वैसा ही क्यों नहीं करते? तुम एक शाखा सड़क की ओर ऎसी निकालो जो सड़क के दूसरे छोर पर खड़े पोल के सम्यक और समान ऊँचाई पर बन पड़े. तब देखना बेनर लगाने वाले तुम्हें जल्दी ही वटवृक्षीय गरिमा प्रदान कर देंगें. भैया, ये विज्ञापन युग है. यहाँ सहजात और स्वाभाविक सौंदर्य मायने नहीं रखता. जितना लिपोगे पुतोगे, उतना ऊँचे जाओगे.

पेड़ ने कहा — भैया, वो कैसे? मैं वटवृक्ष की तरह कैसे दिख सकता हूँ? अगर दिखने भी लगूँ तो क्या आदम समाज मुझे वट मानेगा? पूजा करेगा?

पोल बोला — महीने दो महीने में देखना धडाधड बेनर लगेंगे, और हटेंगे-फटेंगे. उन सभी बैनरों की डोरियाँ तुम्हें वट बना देंगी. सड़क पर सोने वाले और प्रचार की प्रतिस्पर्धा में पड़े अपने लिए सही जगह ढूँढने वाले दोनों प्रकार के लोग इसमें सहयोग करेंगे. गरीबों को तन ढकने को कच्छा, कुर्ता, टॉयलेट के लिए पर्दा सब इसी कपड़े से मिलता है. चुनाव सर पर हैं तुम्हारी तो मोज ही मोज आने वाली है.

पेड़ ने कहा — अरे भैया, क्यों गरीब पेड़ का मज़ाक बनाते हो. आदमी बहुत समझदार प्राणी है. असली-नकली की उसे पहचान है. मेरा ये मुखोटा वह झट पहचान लेगा.

पोल बोला — आदम समाज धीरे-धीरे पेड़ों के नाम, उनकी असल पहचान को भूलता जा रहा है. उसे केवल रेपर नोलिज ही चाहिए. वह ज्ञान के नाम पर वस्तु और प्राणी आदि को कुछ विशेषताओं से ही काम चलाने लगा है. आदमी को आज केवल फल खाने से मतलब रह गया है, पेड़ गिनने से नहीं, और ना ही उसकी समस्याओं से उसको कोई लेना-देना है. तुम अपना वट बनो और सम्मान पाओ. कुछ दिनों में देखना भक्ति में अंधे हुए नयी पीढ़ी के लोग तुम्हारे चारों ओर चबूतरा बनायेंगे, मनौती का कलावा लपेटने लगेंगे. दीपक जलाएंगे, प्रसाद चिपकायेंगे, लटकती सुतलियों पर अपने अपूर्ण अरमानों की ग्रंथियाँ बांधते जायेंगे. तब तुम मुझे मत भूल जाना. क्योंकि तब तक मेरा होलिजन लाइट बल्ब फ्यूज़ होकर गिर चुका होगा. या, उसमें किसी कौवे ने घोंसला कर लिया होगा या, मरे पतंगों की भरमार से मेरा लाइटिंग कवर भर चुका होगा.
तुम शीघ्र बड़े और महान होने वाले हो, मुझे भूल मत जाना मेरे दोस्त.  आने वाले चुनाव का फायदा उठा लो. मौक़ा हाथ से गया तो जल्दी बरगद नहीं बन पाओगे. 

शेष अगले अंक में.
[मैंने अभी "तेल का कुआँ" रोका हुआ है.  जिसे मौक़ा मिलने पर बढाया जाएगा. ]

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

तेल का कुआँ

डिगबोई प्रसाद एक तेल कुआँ था. प्रसाद जी हमेशा लबालब रहते. कोई 'तेल निकाल मजदूर'  उनके पास आता, बर्तन भरभर देते. प्रसाद जी का एक पाईपलाइन से गठबंधन हो चुका था. इससे वो बहुत खुश-खुश रहते. लेकिन गठबंधन के पहले वर्ष में ही लीकेज हुआ और पाईपलाइन फट गयी. तेल सप्लाई बंद करनी पड़ी. प्रसाद जी अकस्मात् टूटे बंधन से बहुत दुखी हुए. वियोग की ज्वाला से दग्ध होकर दिन-रात आँसू बहाते रहते.


प्रसाद जी को यूँ आँसू बहाता देख 'मिटटीशरण' नामक एक पुराने गहरे कुएँ ने कहा — प्यारे डिगबोई! तुम्हें व्यर्थ में इस तरह आँसू नहीं बहाने चाहिए. तेली कुएँ की तो कीचड़ भी कीमती होती है ये तो फिर भी आँसू है. इनसे क्यों नहीं तुम एक काव्य की रचना कर डालते. दुःख के इन अन्तरंग भावों को पुंजीभूत कर एक नयी सप्लाई क्यों नहीं देते. जैसे तुम कह सकते हो — "जो सटी कूप नलिका थी/ बिलकुल अन्दर तक आयी/ किल्लत में फट जाने पर/ हो गयी बंद सप्लाई."


प्रसाद जी को जैसे दिशा मिल गयी. मन पुनः नवीन उमंग से तरंगित हो उठा. मन के तैलीय मवाद को डिगबोई ने कुछ 'तैल-काव्य' प्रस्फुटित करने के बाद अपने को शांत अनुभूत किया.


इस तेल भरे कुएँ में
अब नलिका नहीं उतरती
तरबतर तेल से तो भी
प्यासी लगती हैं धरती.


आती है रिक्त कुएँ से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती झन्नाती-सी
पगली-सी देती फेरी.


भर-भरकर सारे भाण्डे
पी-पीकर प्यारी नलिका
आ-आकर चूसे जाती
दिखला यौवन की कलिका.


दो दर्पण हुए परस्पर
करते छाया-प्रतिछाया
हो गयी न जाने कितनी
उनके बिम्बों की जाया.


खैर, तैल-काव्य तो लंबा चला. बहरहाल डिगबोई प्रसाद जी काव्य रचनाकर्म से संतुष्ट नहीं हुए. मानव रुपी विधाता की इच्छा ने उनका पुनःगठबंधन एक नवीन पाइपलाइन से कर दिया. सप्लाई पुनः प्रारम्भ हो गयी. 


शेष अगले अंक में...

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

हमारी आवाज सुनले बेटा!

http://chitthajagat.in/अब आगे...

रेलबाला जब आगे बढती है तभी उसे अपनी ओर २५-२६ साल का एक युवक आता दिखाई देता है. युवक रेलबाला पर आकर लेट गया और तनाव में काफी देर तक बडबडाता रहा. चेहरे से परेशान दिखने वाला युवक आँसू बहाता रहा. तब रेलबाला ने कहा — "बेटा, इस तरह क्यों जान गँवाता है, जा घर जा. तू जीते जी माँ को मार डालेगा. तेरे कष्टों की पीड़ा ऐसे हल ना होगी. जीकर तो देख, जीवन में आयी कष्टकर परिस्थितियाँ क्या जीवनपर्यंत चलने वाली हैं, नहीं, बिलकुल नहीं, ये दुःख आना-जाना है. सुख की प्रतीक्षा तो कर. कभी तो दुःख का बादल दूर भागेगा. प्यारे! तुझसे लाखों अपेक्षाएँ होंगी. माँ की, पिता की, बहनों की, मित्रों की. संघर्ष की इस विकट परिस्थितियों में अगर तुम डूब गए तो ना जाने कितनों को मानसिक घात लगेगा. जितने लोग तुम्हारे जन्म के समय प्रसन्न हुए होंगे उससे कहीं अधिक लोग व्यथित होंगे. अब जल्दी उठ जा बेटा, ट्रेन आने का समय हो गया है. सिग्नल बदलने वाला है. बेटा, मानजा मेरी बात, माँ की गोदी में बच्चा बनकर लेट जाना. तनाव समाप्त हो जाएगा."

युवक फिर भी पडा-पडा आँसू बहाता रहा. एक शब्द हलक से नहीं निकला, कंठ रुद्ध हो गया. [विधाता ने शायद मनुष्यों को वो कान ही नहीं दिए जो प्रकृति के इन ममत्व से भरपूर दिलासों को सुन पायें.]

पटरीरानी बोलती है — बेटा, मैं जानती हूँ, तेरा दुःख, तुझे महीनों से नौकरी नहीं मिली और दोस्तों का उधार भी बढ़ गया है. एक मालिक ने तुझे वेतन नहीं दिया जिसकी तुझे आशा थी, जो तुझे माँ के पास भेजना था. अब वही आखिरी उम्मीद भी तेरी टूट गयी. बेटा, यूँ हिम्मत ना हार. हमारी आवाज सुनले बेटा!

पटरीरानी और रेलबाला समझाती रह गयीं. लेकिन तीव्र गति से आती हुयी सरकार की नयी दुरंतो ने उसे प्रकृति का स्वर सुनने की शक्ति प्रदान कर दी.  "हे राम"

"राम नाम सत्य है"

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

रिक्शा क़ानून क्यों तोड़ता है...

अब आगे...

जब वे दोनों फाटक प्रहरियों के पास से गुजरीं जहाँ उन्हें गले मिलती एक सड़क ने रोका. दोनों फाटक प्रहरी अपने दोनों ओर गाड़ियों को रोके खड़े थे. लेकिन कुछ कार वाले अपने आगे खड़े रिक्शे वालों को बुराभला कहते धमका रहे थे. रेलबाला ने एक कार में से आती आवाज सुनी —
"अबे हट बिहारी, अपना एरोप्लेन हटा."
रिक्शेवाला बोला — "साहब आगे फाटक बंद है. थोड़ा धीरज रखिये."
कार से आवाज आयी — "सान्नू धीरज दा पाठ सिखाएगा. तू शिक्षामंत्री है. हट जा (अपशब्द!) नहीं तो पोस्टर बना दूंगा. मैंन्नू जल्दी है, फ़ालतू की गल ना कर."
रिक्शे वाले के रिक्शे पहिये की कुछ तारें जब टूट गयीं तब दर्द के मारे रिक्शा फाटक के नीचे से निकलने लगा.  रेलबाला चिल्लायी — देख पटरी बहन, ये क्या कर रहा है, अभी ट्रेन आने वाली है और ये रिक्शा अपनी जान जोखिम में डाल रहा है.
पटरीरानी बोली — ये बिहारी इन हालातों में ही नियम तोड़ते हैं और गवर्नरी गुरूर पाले ओवरब्रिज बोलते हैं कि ये बिहारी नियम तोड़ने में अपनी शान समझते हैं. क्या इसी तरह के कुछ दूसरे प्रान्तों से सम्बंधित सूत्रवाक्य नहीं बनने चाहिए?
रेलबाला बोली — बहन तुझ पर गाडी आ रही है, ज़रा अपने नट-बोल्ट सहित तैयार होकर उसे अगले स्टेशन तक सुरक्षित पहुँचाओ.
कुछ देर तक धडाधड आवाज करती एक जनशताब्दी गुजर जाती है. फाटक प्रहरियों के डंडा हटाने से पहले ही रेलबाला और पटरीरानी आगे बढ़ जाती हैं क्योंकि वहाँ रोजाना की तरह प्रांतवाद वाली गालियों की बौछार होने वाली थी.

[शेष अगले अंक में ....]

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

कल्लोमाई को पहचानो

पटरी रानी की बात अब आगे...

"इन गवर्नर साहब से अच्छी तो बस्ती की गलियाँ हैं जिनमें लगी घूरे की ढेरियाँ ऊपर ही दिख जाती हैं और रास्ता भी बनाए रखती हैं। वहाँ तो केवल मच्छर पनपते हैं जो बीमारी फैलाते हैं लेकिन इन पढ़े लिखे सभ्य शहरी मार्गों ने तो पर्यावरण को जो घाव दिए हैं, वो भरने बेहद मुश्किल हो गए हैं। इनसे त्रस्त शोषित तो अपने नासूरों को देख-देखकर आत्महत्या करने की सोचने लगे हैं। चल, तुझे मैं कल्लोमाई से मिलाती हूँ जो कभी गोरी-चिट्टी हुआ करती थी। इन्हीं कल्चर्ड सिटिजन के संपर्क में आकर कोढ़ से ग्रस्त हो गयी। और आज एक कोढ़ी का जीवन जीने को विवश है।"
पटरीरानी और रेलबाला को अपनी-अपनी सड़कों के सिग्नल हरे दिखाई दिए। तभी धडा-धड़ करती दो गाड़ियां निकल गयीं। रेलबाला ने कहा — बहन, ये जो गाड़ियाँ अभी-अभी गयी हैं तुझे मालुम है इनमें एक गरीब रथ था जो गरीब जनता के लिए वातानुकूलित सुविधा के साथ कम किराए में यात्रा कराता है। इसमें प्रायः उन ग़रीबों का आना-जाना है जो अपनी अमीरी में गरीब हैं जिनका आरक्षण गरीबी की बिना जाँच-पड़ताल हुए हो जाता है। चलो कोई बात नहीं। ग़रीबों की जाति की एक ट्रेन तो चली। वरना, दिल्ली में तो गरीब जाति को ही हटाने की मुहीम ज़ारी है।
दूसरी गाडी मालगाड़ी थी जिसमें जमशेदपुर से लोहा-लंगड़ दिल्ली आया है। यहाँ कितने ही किसानों की ज़मीन विकास के नाम पर ज़बरन अधिगृहित कर ली गयी लेकिन इन बड़े उद्योगपतियों का सीमेंट लोहा अधिगृहित नहीं किया जाता। उन्हें विकास कार्यों के समय भरपूर लाभ दिया जाता है। अधिगृहित जैसे कायदे क़ानून केवल गरीब किसान भाइयों के लिए बने हैं।
तभी रेलबाला ने कहा — पटरी बहन, तुम चलते-चलते मुझे इस नाले के पास क्यों ले आई।
पटरीरानी बोली — नहीं बाला, ये नाला नहीं यमुना नदी है। आजकल इसे सभी सड़कें और रास्ते कल्लोमाई कहते हैं। और अब यमुना नदी भी अपना पुराना नाम भूल गयी है। अब ये कल्लोमाई संबोधन पर ही सुनती है।
एक दिन मैंने ऊपर से जाते हुए इसे यमुना कहकर पुकारा तो चुपचाप रही, ध्यान ही नहीं दिया लेकिन तभी विकासमार्ग वाले लोकनायक सेतु ने इसे कल्लोमाई कहकर जोर से सूखे फूलों का गुच्छा फैंका तो इसने झट से सुनकर कहा — "बेटा, ऐसा मत करो, मेरा कोढ़ बढ़ गया है। खुजली होती है, बदबू उठने लगी है। तुम मेरा ईलाज करवा दो। कृपा होगी। अपने रखरखाव वाले ठेकेदार से बोलो मेरा भी उद्धार करे।"
बाला ! तब जाना मैंने इसके दुःख को। अरे, कुछ सालों पहले तक इसमें मैं अपनी शक्ल साफ़ देख पाती थी लेकिन अब तो मुझे मेरी शक्ल भी बदरंग दिखती है।
तभी पटरीरानी ने यमुना नदी को आवाज़ लगाई — कल्लोमाई, रामराम, कैसी हो।
कल्लोमाई — रामराम, बच्चों, 'कैसी हो' कहकर मेरा क्यों परिहास उडाती हो। देखती नहीं हो मेरी दशा। ये कोढ़, ये गंदगी, ये बदबू, अब तो मैं अपने भाई यम से मिलने का सोचने लगी हूँ। यहाँ के लोगों ने तो मेरी बेकदरी कर दी। अब यहाँ पर रहने की इच्छा नहीं रह गयी है। तुम बताओ, कैसी हो? तुम रात-दिन बहुत चिल्लाती हो, तुम्हारा शोर प्रशासन के कान तक पहुँचता या नहीं। पिछली बार तुम कह रही थी कि तुम्हारे नट-बोल्ट ढीले हो रहे हैं। क्या उन्हें बदला गया या नहीं?
पटरीरानी ने कहा — कुछ बदले तो गए हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं लगती। एक बरसात-धूप में ही जंगियाने लगे हैं। अपना काम चला रही हूँ। आप बताओ, तुम्हारे कोढ़ और खुजली में कुछ राहत है?
कल्लोमाई — अरे नहीं बच्चों! एक फूल लिपटे अखबार में ज़रूर पढ़ा था कि कुछ दिनों पहले कुछ प्रांत सरकारों ने मेरे ईलाज के लिए अभियान चलाने की बात ज़रूर की है लेकिन देखो ये कब होता है? संगम पर जाकर मुझे पता चला कि गंगा बहन की भी हालत मुझ जैसी होती जा रही है। सैकड़ों नालों ने हमारा हाल खराब कर दिया है। फैक्ट्रियों, कल-कारखानों से निकलता तेजाबी कचरा मेरे कोढ़ में खुजली बनकर आ रहा है। लेकिन आज भी कुछ मेरे भक्तगण मुझमें दुबकी लगाते हैं पर मुझसे उन्हें लाभ पहुंचाने के बदले खुजली जैसी बीमारियाँ लग जाती हैं। क्या करूँ न भक्त मानते हैं न पूँजी के आसक्त लोग ही मानते हैं। देखो, कब तक यूँ जी पाती हूँ। आजकल बड़े-बूढों की वैसे भी कोई इज्जत नहीं रह गयी है। "बच्चो! तुम अपने काम में लगो। आते रहना, मेरे हाल-चाल लेते रहना। मुझे लगेगा कोई तो है मुझसे बात करने वाला।"
कल्लोमाई से विदा लेकर पटरीरानी रेलबाला के साथ आगे बढ़ गयी।
शेष भाग अगले अंक में...

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