सोमवार, 7 जनवरी 2013

चामिला : एक स्मृति कथा

संस्मरण लेखन का पहला प्रयास, 1993
मेरा सामान्य व्यक्तियों के प्रति अनुपेक्षा का भाव सदा से नहीं रहा। सामान्य और विशेष व्यक्ति होने का मापदंड, मेरी समझ से, संतोष और साधन-सम्पन्नता की मात्रा पर आधारित है। गुणों को तो प्रायः गौणता ही दी जाती रही है। वैसे प्रत्येक स्थान अपने आप में विशेषता लिए होता है, किन्तु मान्यता यही है कि ग्राम्य जीवन 'सामान्य' और नगरीय जीवें 'विशेष' होता है। पर यह आवश्यक नहीं कि ग्राम्य परिवेश में पला व्यक्ति सामान्य ही हो या नगरीय परिवेश जिया व्यक्ति विशेष। असाधारणताएँ किसी सामान्य में भी खोजी जा सकती हैं -- दृष्टि चाहिए। साधनहीनता में भी प्रसन्नता का भाव जहाँ ग्रामीणों में देखा जा सकता है, अन्यत्र नहीं। नगरीय जीवन तो स्वार्थ साधने की प्रतियोगिता मात्र है। 'उपेक्षा और तिरस्कार मिलने पर भी ईश्वर तक से शिकायत न होना' क्या विशाल हृदयता का द्योतक नहीं? ईश्वर दिखे न दिखे, फिर भी उसके होने में अटूट विश्वास; वह भला करे न करे, फिर भी उसमें प्रगाढ़ आस्था -- क्या मात्र मूर्खता ही है; अपनी संस्कृति का सच्चे अर्थों में पोषण नहीं, परम्पराओं को जीवित रखने का सर्वोत्तम माध्यम नहीं? अवश्य है। सभी वही नहीं जो दिखते हैं, अपितु वे भी हैं जो कथित सभ्यताओं का निःस्वार्थ सम्मान किया करते हैं। 'सौंदर्य किसका कहाँ विकसित हो जावे?' --यह प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है। यह बोध किसी को नगर के ऊँचे-ऊँचे भवनों की अट्टालिकाओं को देख होता है तो किसी को खेत-खलिहानों, पशुओं, पोखरों, जंगलों, छप्पर वाले घरों की दीवारों पर पथे उपलों और बिटोरों आदि के देखने मात्र से हो जाया करता है।
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'वसुधैव कुटुंब' का भाव मुझे अब अधिक प्रिय और सार्थक-सा लगने लगा है। ना जाने क्यों, अब वे सभी बातें समाप्त होती जा रही हैं जो मुझमें कुछ पहले तक हुआ करती थीं -- संकुचित विचार, अंग्रेजों और मुसलमानों के प्रति घृणित भाव, दक्षिण भारतीयों के बोलने के ढंग पर मज़ाक बनाना, श्रीलंका के आदिम लोगों को राम कथा के आधार पर कल्पना से राक्षसी प्रवृत्ति का मान बैठना।
अनजाने में किसी का कोमल-स्पर्श भी प्रेम का कारण बन सकता है। मुझे याद है; जब कड़ाके की ठण्ड थी, रात्रि में मैं एनी अपरिचित छोटे-बड़े साथियों के साथ ऊँघते हुए बस में यात्रा कर रहा था, तब मेरी ही सीट पर एक ठिठुरते बच्चे के कोमल स्पर्श ने मुझे उसे भी अपने कम्बल में छिपा लेने को बाध्य कर दिया था। उसने भी उस अँधेरे में मेरे आलिंगन को सहजता से स्वीकारा था। उस रात उस बच्चे के कोमल स्पर्श ने मुझे जो सुख की नींद सुला दिया था, सुबह होते ही वह सुखानुभूति जुगुप्सा में परिणत हो गयी, जब मैंने सुबह के हलके प्रकाश में कम्बल और उसकी शॉल में से उसके पैरों को पोलियोग्रस्त पाया। तब मुझे बच्चे की विकलांगता मेरी सुखानुभूति का परिहास करती प्रतीत हुई थी। बच्चा जाग गया था। वह मेरे तिरस्कार भाव का भास् पाते ही स्वयं की शॉल में सिमटकर बैठ गया। हमारी बस शिविर स्थल पर शीघ्र पहुँचने के लिए दौड़ी जा रही थी। बाक़ी शिविरार्थी-साथी अपनी-अपनी रजाइयों-कम्बलों में दुबके ऊँघ रहे थे। कुछ एक मेरी ही भाँति अपने सामीप्य से गरमाहट और स्पर्श का घृणित आनंद लेते हुए जान पड़े। --- यह घटना मुझे तब तक आत्मग्लानि का भास कराती रही थी जब तक कि जीवन की एनी मधुर स्मृतियों ने इसे विस्मृत न कर दिया। लेकिन कुछ मधुर स्मृतियों का प्रारम्भ तो मधुर है पर उसका दुखांत एक दूसरी आत्मग्लानि से परिपूर्ण घटना का स्मरण करा ही देता है। ..... उस विकलांग बालक का शिविर में आने का औचित्य मुझे तब समझ आया जब मैंने उसे हाथों के बल दौड़ते-भागते देखा। उसके हाथ ही पैर थे। यह शिविर विशेषतः शस्त्र-शिक्षा के लिए लगाया गया था।
[2]
नृत्य की आरंभिक शिक्षा मात्र लेकर अचानक चामिला का स्वदेश लौट जाना मुझे खला था। 'नमस्ते' के अतिरिक्त उनसे कभी कुछ बात नहीं हुई। लेकिन अब मुझे लगता है, मैंने मौन भाषा में उनसे काफी-कुछ बातें की हैं। कवि-ह्रदय के लिए चामिला पद्मनी श्रेणी की सौम्यमुखी सिंघली व आंग्ल भाषी कन्या थी। वे सूर्या से तो सिंघली में ही बातें करती, किन्तु मुझे उनकी मौन-भाषा सबसे अधिक प्रिय थी। ...
शेष ... फुर्सत मिलते ही

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

पगडंडी करे सवाल

 एक गाँव था। गाँव में थी एक कच्ची सड़क। उस कच्ची सड़क पर आने के लिए लोगों के चलने से एक पगडंडी का जन्म हुआ। पगडंडी जन्म से ही बहुत तेज थी। जो भी उसपर चलता वह तुरंत उसे कच्ची सड़क पर पहुँचा देती। इस कारण उसे सभी राहगीर प्यार करते थे। सड़क मौसी भी उसे बहुत प्यार करती थी।

छोटी पगडंडी सबको रोज़ आते-जाते देखती और सोचती- 'लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?' इसका कारण उसकी समझ में नहीं आया। इसलिए वह सड़क मौसी के पास गई और बोली- "मौसी! लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?" सड़क मौसी ने कहा- "बेटी! मुझे तो पता नहीं। शायद पंचायती रास्ते को पता हो! उनसे पूछकर बताउँगी।"

 पगडंडी के सवाल को लेकर सड़क मौसी पंचायती रास्ते से जाकर मिली। कच्ची सड़क ने पंचायती रास्ते से कहा- "चौधरी साहब! बिटिया पूछती है कि लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?" यह सुनकर चौधरी साहब को गुस्सा गया। डपटकर बोले- "पग्गू बिटिया से बोलो की फालतू बातों में दिमाग लगाये। चुपचाप अपना काम करे और खेले-कूदे।" सड़क मौसी ने कहा- "बिटिया मानती ही नहीं। जिद पकड़कर बैठ गई है कि जब तक नहीं बताएँगे वह किसी से बोलेगी।"

पंचायती रास्ते के मन में पगडंडी का सवाल सुनकर खलबली मच गई थी। उत्तर उनको पता था। उन्होंने सोचा कि शहर जाने वाले नये रास्ते को जरूर पता होगा। उन्होंने कच्ची सड़क से कहा- "बहन! तुम बिटिया के पास जाओ। मैं तब तक शहरी रास्ते से पूछकर आता हूँ।"


पंचायती रास्ते ने शहर जाने वाले नये रास्ते से जाकर भेंट की। बोले- "बेटा! तुम तो शहर जाकर बहुत होशियार हो गये हो। हमारी गाँव की पगडंडी बिटिया ने एक सवाल किया है। ज़रा बताओ तो लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?"

शहरी रास्ता सवाल सुनकर सकपका गया। बोला- "ऐसा सवाल तो मैंने कभी सुना नहीं। जरूर राजमार्ग को पता होगा। आप गाँव वापस लौटकर जाइए मैं तब तक राजमार्ग के पास जाकर पता लगाता हूँ।"


शहरी रास्ता राजमार्ग से जाकर मिला। राजमार्ग ने पूछा- ''महाशय, कैसे आना हुआ?'' शहरी रास्ते ने कहा- ''गाँव की एक पगडंडी का सवाल है कि लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?''

पगडंडी का सवाल सुनकर राजमार्ग के होश उड़ गये। बोला- ''अरे, तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं है, लोगों को पगडंडी पर चलने की क्या जरूरत है? वे बने-बनाये रास्तों पर क्यों नहीं चलते। पगडंडी पर कँटीली झाड़ियाँ डाल दो। न लोग उसपर चलेंगे न ही कोई सवाल पैदा होगा।''

फिर भी राजमार्ग के मन में उथल-पुथल होती रही। राजमार्ग ने चुपचाप संसदमार्ग से जाकर पूछने का सोचा।


राजमार्ग संसद मार्ग के पास आया। संसद मार्ग ने राजमार्ग से पूछा- ''कहो कैसे आना हुआ? सब कुछ ठीक तो है ना?'' राजमार्ग ने सकुचाते हुए बोला- ''नेताजी, गाँव के लोग अब सवाल करने लगे हैं। एक छोटी पगडंडी ने पूछा है कि लोग चलते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं? मैं क्या जवाब दूँ?''

संसदमार्ग ने अपने पूरे जीवन में पहली बार कोई सवाल सुना था। सुनकर चौंके और बोले इसका तो मुझपर भी कोई उत्तर नहीं है। उन्होंने तुरंत सभी राजमार्गों की आपात बैठक बुलाई।


बैठक में संसदमार्ग और राजमार्गों के बीच पगडंडी के छोटे से सवाल पर चर्चा आरंभ हुई। कोई भी राजमार्ग इस सवाल का जवाब न दे सका। तब संसदमार्ग ने परेशान होकर सभी राजमार्गों से कहा- ''जहाँ से भी पता चले पगडंडी के इस सवाल का जवाब खोजकर लाओ कि 'लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?' जो भी इसका सही जवाब देगा उसे ईनाम दिया जाएगा।''

बैठक समाप्त हुई। सभी राजमार्ग अपने-अपने राज्यों को लौट गए।


सवाल का जवाब खोजते-खोजते एक राजमार्ग एक टूटे-फूटे पथ पर गया। राजमार्ग थककर वहीं बैठ गया। वह पथ एक विद्यालय को जाता था। राजमार्ग को उदास बैठा देखकर विद्यालय पथ ने पूछा- "क्या बात है राजमार्ग जी! आप इतना उदास क्यों हैं?"

राजमार्ग ने कहा- "बेटा! एक सवाल है जिसका जवाब नहीं मिल रहा है। क्या तुम बता सकते हो कि लोग चलते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं?"

विद्यालय पथ ने खुश होकर कहा- "जब पैर आगे बढ़ें और हाथ उनकी नकल करें। इससे चलने वाले की थकान कम हो जाती है। हाथ-पैरों के एक साथ चलने से शरीर का संतुलन बिगड़ता नहीं और यात्रा आरामदायक हो जाती है।

जवाब सुनकर राजमार्ग बहुत खुश हुआ और उसने विद्यालय-पथ को शाबासी दी।


राजमार्ग ने संसदमार्ग के पास जाकर पगडंडी के सवाल का जवाब बता दिया। संसदमार्ग ने पूछा- "यह तो बताओ कि यह जवाब तुम्हें कहाँ मिला?"

राजमार्ग ने कहा- "नेताजी! जब मैं हार-थककर एक टूटे-फूटे पथ पर जाकर बैठ गया। तब उस टूटे-फूटे पथ ने ही मुझे यह जवाब दिया।"

संसदमार्ग ने पूछा- "यह तो बताओ कि उसका नाम क्या है?"

राजमार्ग ने कहा- "उसका नाम विद्यालय-पथ है।"

संसदमार्ग ने चहकते हुए कहा- "अच्छा तो... जो विद्यालय जाता, वही बता पाता।"


कथा : प्रतुल वशिष्ठ; चित्रांकन : हेमलता यादव

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