शनिवार, 10 अप्रैल 2010

तेल का कुआँ

डिगबोई प्रसाद एक तेल कुआँ था. प्रसाद जी हमेशा लबालब रहते. कोई 'तेल निकाल मजदूर'  उनके पास आता, बर्तन भरभर देते. प्रसाद जी का एक पाईपलाइन से गठबंधन हो चुका था. इससे वो बहुत खुश-खुश रहते. लेकिन गठबंधन के पहले वर्ष में ही लीकेज हुआ और पाईपलाइन फट गयी. तेल सप्लाई बंद करनी पड़ी. प्रसाद जी अकस्मात् टूटे बंधन से बहुत दुखी हुए. वियोग की ज्वाला से दग्ध होकर दिन-रात आँसू बहाते रहते.


प्रसाद जी को यूँ आँसू बहाता देख 'मिटटीशरण' नामक एक पुराने गहरे कुएँ ने कहा — प्यारे डिगबोई! तुम्हें व्यर्थ में इस तरह आँसू नहीं बहाने चाहिए. तेली कुएँ की तो कीचड़ भी कीमती होती है ये तो फिर भी आँसू है. इनसे क्यों नहीं तुम एक काव्य की रचना कर डालते. दुःख के इन अन्तरंग भावों को पुंजीभूत कर एक नयी सप्लाई क्यों नहीं देते. जैसे तुम कह सकते हो — "जो सटी कूप नलिका थी/ बिलकुल अन्दर तक आयी/ किल्लत में फट जाने पर/ हो गयी बंद सप्लाई."


प्रसाद जी को जैसे दिशा मिल गयी. मन पुनः नवीन उमंग से तरंगित हो उठा. मन के तैलीय मवाद को डिगबोई ने कुछ 'तैल-काव्य' प्रस्फुटित करने के बाद अपने को शांत अनुभूत किया.


इस तेल भरे कुएँ में
अब नलिका नहीं उतरती
तरबतर तेल से तो भी
प्यासी लगती हैं धरती.


आती है रिक्त कुएँ से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती झन्नाती-सी
पगली-सी देती फेरी.


भर-भरकर सारे भाण्डे
पी-पीकर प्यारी नलिका
आ-आकर चूसे जाती
दिखला यौवन की कलिका.


दो दर्पण हुए परस्पर
करते छाया-प्रतिछाया
हो गयी न जाने कितनी
उनके बिम्बों की जाया.


खैर, तैल-काव्य तो लंबा चला. बहरहाल डिगबोई प्रसाद जी काव्य रचनाकर्म से संतुष्ट नहीं हुए. मानव रुपी विधाता की इच्छा ने उनका पुनःगठबंधन एक नवीन पाइपलाइन से कर दिया. सप्लाई पुनः प्रारम्भ हो गयी. 


शेष अगले अंक में...

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