सोमवार, 9 अप्रैल 2012

पगडंडी करे सवाल

 एक गाँव था। गाँव में थी एक कच्ची सड़क। उस कच्ची सड़क पर आने के लिए लोगों के चलने से एक पगडंडी का जन्म हुआ। पगडंडी जन्म से ही बहुत तेज थी। जो भी उसपर चलता वह तुरंत उसे कच्ची सड़क पर पहुँचा देती। इस कारण उसे सभी राहगीर प्यार करते थे। सड़क मौसी भी उसे बहुत प्यार करती थी।

छोटी पगडंडी सबको रोज़ आते-जाते देखती और सोचती- 'लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?' इसका कारण उसकी समझ में नहीं आया। इसलिए वह सड़क मौसी के पास गई और बोली- "मौसी! लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?" सड़क मौसी ने कहा- "बेटी! मुझे तो पता नहीं। शायद पंचायती रास्ते को पता हो! उनसे पूछकर बताउँगी।"

 पगडंडी के सवाल को लेकर सड़क मौसी पंचायती रास्ते से जाकर मिली। कच्ची सड़क ने पंचायती रास्ते से कहा- "चौधरी साहब! बिटिया पूछती है कि लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?" यह सुनकर चौधरी साहब को गुस्सा गया। डपटकर बोले- "पग्गू बिटिया से बोलो की फालतू बातों में दिमाग लगाये। चुपचाप अपना काम करे और खेले-कूदे।" सड़क मौसी ने कहा- "बिटिया मानती ही नहीं। जिद पकड़कर बैठ गई है कि जब तक नहीं बताएँगे वह किसी से बोलेगी।"

पंचायती रास्ते के मन में पगडंडी का सवाल सुनकर खलबली मच गई थी। उत्तर उनको पता था। उन्होंने सोचा कि शहर जाने वाले नये रास्ते को जरूर पता होगा। उन्होंने कच्ची सड़क से कहा- "बहन! तुम बिटिया के पास जाओ। मैं तब तक शहरी रास्ते से पूछकर आता हूँ।"


पंचायती रास्ते ने शहर जाने वाले नये रास्ते से जाकर भेंट की। बोले- "बेटा! तुम तो शहर जाकर बहुत होशियार हो गये हो। हमारी गाँव की पगडंडी बिटिया ने एक सवाल किया है। ज़रा बताओ तो लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?"

शहरी रास्ता सवाल सुनकर सकपका गया। बोला- "ऐसा सवाल तो मैंने कभी सुना नहीं। जरूर राजमार्ग को पता होगा। आप गाँव वापस लौटकर जाइए मैं तब तक राजमार्ग के पास जाकर पता लगाता हूँ।"


शहरी रास्ता राजमार्ग से जाकर मिला। राजमार्ग ने पूछा- ''महाशय, कैसे आना हुआ?'' शहरी रास्ते ने कहा- ''गाँव की एक पगडंडी का सवाल है कि लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?''

पगडंडी का सवाल सुनकर राजमार्ग के होश उड़ गये। बोला- ''अरे, तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं है, लोगों को पगडंडी पर चलने की क्या जरूरत है? वे बने-बनाये रास्तों पर क्यों नहीं चलते। पगडंडी पर कँटीली झाड़ियाँ डाल दो। न लोग उसपर चलेंगे न ही कोई सवाल पैदा होगा।''

फिर भी राजमार्ग के मन में उथल-पुथल होती रही। राजमार्ग ने चुपचाप संसदमार्ग से जाकर पूछने का सोचा।


राजमार्ग संसद मार्ग के पास आया। संसद मार्ग ने राजमार्ग से पूछा- ''कहो कैसे आना हुआ? सब कुछ ठीक तो है ना?'' राजमार्ग ने सकुचाते हुए बोला- ''नेताजी, गाँव के लोग अब सवाल करने लगे हैं। एक छोटी पगडंडी ने पूछा है कि लोग चलते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं? मैं क्या जवाब दूँ?''

संसदमार्ग ने अपने पूरे जीवन में पहली बार कोई सवाल सुना था। सुनकर चौंके और बोले इसका तो मुझपर भी कोई उत्तर नहीं है। उन्होंने तुरंत सभी राजमार्गों की आपात बैठक बुलाई।


बैठक में संसदमार्ग और राजमार्गों के बीच पगडंडी के छोटे से सवाल पर चर्चा आरंभ हुई। कोई भी राजमार्ग इस सवाल का जवाब न दे सका। तब संसदमार्ग ने परेशान होकर सभी राजमार्गों से कहा- ''जहाँ से भी पता चले पगडंडी के इस सवाल का जवाब खोजकर लाओ कि 'लोग चलते हुए अपने हाथ क्यों हिलाते हैं?' जो भी इसका सही जवाब देगा उसे ईनाम दिया जाएगा।''

बैठक समाप्त हुई। सभी राजमार्ग अपने-अपने राज्यों को लौट गए।


सवाल का जवाब खोजते-खोजते एक राजमार्ग एक टूटे-फूटे पथ पर गया। राजमार्ग थककर वहीं बैठ गया। वह पथ एक विद्यालय को जाता था। राजमार्ग को उदास बैठा देखकर विद्यालय पथ ने पूछा- "क्या बात है राजमार्ग जी! आप इतना उदास क्यों हैं?"

राजमार्ग ने कहा- "बेटा! एक सवाल है जिसका जवाब नहीं मिल रहा है। क्या तुम बता सकते हो कि लोग चलते हुए हाथ क्यों हिलाते हैं?"

विद्यालय पथ ने खुश होकर कहा- "जब पैर आगे बढ़ें और हाथ उनकी नकल करें। इससे चलने वाले की थकान कम हो जाती है। हाथ-पैरों के एक साथ चलने से शरीर का संतुलन बिगड़ता नहीं और यात्रा आरामदायक हो जाती है।

जवाब सुनकर राजमार्ग बहुत खुश हुआ और उसने विद्यालय-पथ को शाबासी दी।


राजमार्ग ने संसदमार्ग के पास जाकर पगडंडी के सवाल का जवाब बता दिया। संसदमार्ग ने पूछा- "यह तो बताओ कि यह जवाब तुम्हें कहाँ मिला?"

राजमार्ग ने कहा- "नेताजी! जब मैं हार-थककर एक टूटे-फूटे पथ पर जाकर बैठ गया। तब उस टूटे-फूटे पथ ने ही मुझे यह जवाब दिया।"

संसदमार्ग ने पूछा- "यह तो बताओ कि उसका नाम क्या है?"

राजमार्ग ने कहा- "उसका नाम विद्यालय-पथ है।"

संसदमार्ग ने चहकते हुए कहा- "अच्छा तो... जो विद्यालय जाता, वही बता पाता।"


कथा : प्रतुल वशिष्ठ; चित्रांकन : हेमलता यादव

http://raamkahaani.blogspot.com/

मेरी ब्लॉग सूची

प्रपंचतन्त्र

समर्थक

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
जीवन का एक ही सूत्र "मौन भंग मौन संग"