शनिवार, 3 दिसंबर 2011

लाख का कीड़ा

यह मेरी मौलिक रचना नहीं है


रेडियो पर अपनी पसंद के गाने आपने सुने ही होंगे ...ब्याह-शादियों में और घरों में रेडियोग्राम और ग्रामोफोन पर रिकार्ड बजते हुए भी आपने देखा और सुना होगा. गोल घूमते चक्के जिनके भीतर गानों और बाजों की मधुर आवाज़ भरी रहती थी ... जानते हो किस पदार्थ से बनते थे और आज भी कहीं-कहीं बनते हैं? 
— लाख से!!
— और लाख कहाँ से आती है?
— "लाख देता हूँ मैं, यानी लाख का कीड़ा. मेरी चार जातियाँ ऎसी हैं जिनसे उच्च कोटि की लाख मिलती है. ये हैं लेसोफर, टेकार्डिया, टेकार्डिस्ला और टेकार्डिना."

" मैं एशिया के लगभग सभी देशों में पाया जाता हूँ. पर भारत की जलवायु मुझे सबसे ज़्यादा भाती है. यहाँ मैं पाया जाता हूँ. यही कारण है कि लाख का उद्योग चलानेवाले देशों में भारत का स्थान पहला है. भारत के अलावा मैं बर्मा, कम्बोडिया, फार्मोसा, लाओस, उत्तरी वियतनाम, मलाया, पाकिस्तान, नेपाल आदि देशों में भी पाया जाता हूँ.

अण्डों से निकलने के बाद मैं अपनी ज़िन्दगी एक छोटी नाव के आकार की गुलाबी-लाल इल्ली के रूप में आरम्भ करता हूँ. वृक्षों के नरम, रसीले भागों से लिपटकर रहने वाली मेरी इल्लियाँ इन्हीं भागों का रस पीती हैं. कुछ समय बाद इल्लियों के शरीर से गाढ़े, चिपचिपे लाल तरल के रूप में लाख बाहर निकलने लगती है. लाख बनाने वाली ग्रंथियाँ त्वचा के नीचे मेरे पूरे शरीर में फैली रहती हैं और उनसे हमेशा लाख निकलती रहती है. सूखने पर यह लाख कड़ी पड़ जाती है. इसकी वजह से कहीं मेरा पूरा बदन ही ढक न जाए, इसलिए प्रकृति ने मेरे शरीर में कुछेक मोम बनाने वाली ग्रंथियाँ भी बनाई हैं. मोम के कारण लाख मेरे मुँह, साँस लेने के छेदों और मल द्वार के ऊपर नहीं जमने पाता. जैसे-जैसे मेरी इल्लियों का शरीर बढ़ता जाता है, निकलने वाली लाख की मात्रा भी बढ़ती जाती है. बड़ा होने से पूर्व मेरी इल्लियों की तीन बार कायापलट होती है. इसी दौरान नर और मादा कीड़े का शरीर भी अलग-अलग रूप धारण करता है. मादा नर से आकार में लगभग बड़ी होती है और उसके पर नहीं होते. साथ ही मादा में आँखे और पैर भी अनुपस्थित रहते हैं. नर परवाले और बगैर परवाले दोनों ही तरह के होते हैं.

मेरी इल्लियाँ बड़ी होते समय जिस टहनी पर घर बसाती हैं, लाख उसी पर जम जाती है. मैं जंगली उगे हुए या विशेष रूप से लाख के लिए उगाये – दोनों प्रकार के पौधों पर उगाया जाता हूँ. जिन पेड़ों पर रहना मैं अधिक पसंद करता हूँ, वह हैं पलाश, बेर, बरगद, कुसुम, पीपल, बबूल आदि. इन्हीं पेड़ों की टहनियों पर बने मेरे लाख के घरों को तुमने शायद देखा होगा. मेरे ये घर तेज़ हवा, पानी और गरमी से मेरी रक्षा करते हैं. इन्हीं के अन्दर मेरी मादा अंडे देकर नए-नए कुनबे बनाती है. लाख का धंधा करने वाले लोग मेरे इन घरों को बटोरकर ले जाते हैं और आँच दिखलाकर लाख को पिघला लेते हैं. ऐसा करने पर लाख भले ही मिल जाए पर मेरी तो मृत्यु हो जाती है. लेकिन अब मनुष्यों को भी थोड़ी अक्ल आ गयी है. उन्हें पता चल गया है कि लाख को मैं और मेरे भाई-बहन बड़ी मेहनत से बनाते हैं. साथ ही थोड़ी-सी लाख तैयार करने में भी बहुत सारे कीड़ों की आवश्यकता होती है. इसलिए लाख निकालने के लालच में हमें आग में भून डालना उचित नहीं है. अब उसने लाख प्राप्त करने के लिए लाख की खेती करने के नए वैज्ञानिक तरीके खोज निकाले हैं. यहाँ पर मैं तुम्हें यह भी बता दूं कि मेरे पंद्रह लाख साथी अपने जीवन भर में जितनी लाख तैयार करते हैं, उससे ग्रामोफोन का केवल एक रिकार्ड बन पाता है. वह तो गनीमत है कि मैं अरबों-खरबों की संख्या में बढ़ता और फैलता हूँ, वरना लाख जैसी उपयोगी वस्तु तुम्हें मिलती ही कहाँ!

अब सुनो लाख की उपयोगिता के बारे में भी कुछ बातें...
प्राचीन काल से ही लाख के महत्व को लोग जानते हैं. इसे पिघलाकर मनचाहे आकार में बदला जा सकता है, यह बात महाभारत के काल में भी पता थी. तभी तो कौरवों के राजा दुर्योधन ने पांडवों को भस्म कर डालने की इच्छा से उनके लिए लाख का 'लाक्षागृह' बनवाया था. पहले लाख का उपयोग रेशम, ऊन और चमड़ा रंगने के लिए किया जाता था. पर नकली रंगों के बन जाने से लाख का उपयोग अब इन कार्यों में नहीं किया जाता. आजकल लाख का प्रमुख उपयोग ग्रामोफोन के रिकोर्ड बनाने के लिए ही किया जाता है, लाख से खिलौने, चूड़ियाँ, सजावटी सामान आदि भी बनाए जाते हैं. सील-मुहर लगाने के लिए भी लाख काम में आती है और इससे लकड़ी के फर्नीचर चमकाने के लिए बढ़िया पालिशें भी बनती हैं.
तो तुमने देखा कि मैं कद में छोटा होते हुए भी तुम्हारे कितने काम का रहा हूँ... मान गए न मेरा लोहा!


http://raamkahaani.blogspot.com/

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