शनिवार, 3 अप्रैल 2010

कल्लोमाई को पहचानो

पटरी रानी की बात अब आगे...

"इन गवर्नर साहब से अच्छी तो बस्ती की गलियाँ हैं जिनमें लगी घूरे की ढेरियाँ ऊपर ही दिख जाती हैं और रास्ता भी बनाए रखती हैं। वहाँ तो केवल मच्छर पनपते हैं जो बीमारी फैलाते हैं लेकिन इन पढ़े लिखे सभ्य शहरी मार्गों ने तो पर्यावरण को जो घाव दिए हैं, वो भरने बेहद मुश्किल हो गए हैं। इनसे त्रस्त शोषित तो अपने नासूरों को देख-देखकर आत्महत्या करने की सोचने लगे हैं। चल, तुझे मैं कल्लोमाई से मिलाती हूँ जो कभी गोरी-चिट्टी हुआ करती थी। इन्हीं कल्चर्ड सिटिजन के संपर्क में आकर कोढ़ से ग्रस्त हो गयी। और आज एक कोढ़ी का जीवन जीने को विवश है।"
पटरीरानी और रेलबाला को अपनी-अपनी सड़कों के सिग्नल हरे दिखाई दिए। तभी धडा-धड़ करती दो गाड़ियां निकल गयीं। रेलबाला ने कहा — बहन, ये जो गाड़ियाँ अभी-अभी गयी हैं तुझे मालुम है इनमें एक गरीब रथ था जो गरीब जनता के लिए वातानुकूलित सुविधा के साथ कम किराए में यात्रा कराता है। इसमें प्रायः उन ग़रीबों का आना-जाना है जो अपनी अमीरी में गरीब हैं जिनका आरक्षण गरीबी की बिना जाँच-पड़ताल हुए हो जाता है। चलो कोई बात नहीं। ग़रीबों की जाति की एक ट्रेन तो चली। वरना, दिल्ली में तो गरीब जाति को ही हटाने की मुहीम ज़ारी है।
दूसरी गाडी मालगाड़ी थी जिसमें जमशेदपुर से लोहा-लंगड़ दिल्ली आया है। यहाँ कितने ही किसानों की ज़मीन विकास के नाम पर ज़बरन अधिगृहित कर ली गयी लेकिन इन बड़े उद्योगपतियों का सीमेंट लोहा अधिगृहित नहीं किया जाता। उन्हें विकास कार्यों के समय भरपूर लाभ दिया जाता है। अधिगृहित जैसे कायदे क़ानून केवल गरीब किसान भाइयों के लिए बने हैं।
तभी रेलबाला ने कहा — पटरी बहन, तुम चलते-चलते मुझे इस नाले के पास क्यों ले आई।
पटरीरानी बोली — नहीं बाला, ये नाला नहीं यमुना नदी है। आजकल इसे सभी सड़कें और रास्ते कल्लोमाई कहते हैं। और अब यमुना नदी भी अपना पुराना नाम भूल गयी है। अब ये कल्लोमाई संबोधन पर ही सुनती है।
एक दिन मैंने ऊपर से जाते हुए इसे यमुना कहकर पुकारा तो चुपचाप रही, ध्यान ही नहीं दिया लेकिन तभी विकासमार्ग वाले लोकनायक सेतु ने इसे कल्लोमाई कहकर जोर से सूखे फूलों का गुच्छा फैंका तो इसने झट से सुनकर कहा — "बेटा, ऐसा मत करो, मेरा कोढ़ बढ़ गया है। खुजली होती है, बदबू उठने लगी है। तुम मेरा ईलाज करवा दो। कृपा होगी। अपने रखरखाव वाले ठेकेदार से बोलो मेरा भी उद्धार करे।"
बाला ! तब जाना मैंने इसके दुःख को। अरे, कुछ सालों पहले तक इसमें मैं अपनी शक्ल साफ़ देख पाती थी लेकिन अब तो मुझे मेरी शक्ल भी बदरंग दिखती है।
तभी पटरीरानी ने यमुना नदी को आवाज़ लगाई — कल्लोमाई, रामराम, कैसी हो।
कल्लोमाई — रामराम, बच्चों, 'कैसी हो' कहकर मेरा क्यों परिहास उडाती हो। देखती नहीं हो मेरी दशा। ये कोढ़, ये गंदगी, ये बदबू, अब तो मैं अपने भाई यम से मिलने का सोचने लगी हूँ। यहाँ के लोगों ने तो मेरी बेकदरी कर दी। अब यहाँ पर रहने की इच्छा नहीं रह गयी है। तुम बताओ, कैसी हो? तुम रात-दिन बहुत चिल्लाती हो, तुम्हारा शोर प्रशासन के कान तक पहुँचता या नहीं। पिछली बार तुम कह रही थी कि तुम्हारे नट-बोल्ट ढीले हो रहे हैं। क्या उन्हें बदला गया या नहीं?
पटरीरानी ने कहा — कुछ बदले तो गए हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं लगती। एक बरसात-धूप में ही जंगियाने लगे हैं। अपना काम चला रही हूँ। आप बताओ, तुम्हारे कोढ़ और खुजली में कुछ राहत है?
कल्लोमाई — अरे नहीं बच्चों! एक फूल लिपटे अखबार में ज़रूर पढ़ा था कि कुछ दिनों पहले कुछ प्रांत सरकारों ने मेरे ईलाज के लिए अभियान चलाने की बात ज़रूर की है लेकिन देखो ये कब होता है? संगम पर जाकर मुझे पता चला कि गंगा बहन की भी हालत मुझ जैसी होती जा रही है। सैकड़ों नालों ने हमारा हाल खराब कर दिया है। फैक्ट्रियों, कल-कारखानों से निकलता तेजाबी कचरा मेरे कोढ़ में खुजली बनकर आ रहा है। लेकिन आज भी कुछ मेरे भक्तगण मुझमें दुबकी लगाते हैं पर मुझसे उन्हें लाभ पहुंचाने के बदले खुजली जैसी बीमारियाँ लग जाती हैं। क्या करूँ न भक्त मानते हैं न पूँजी के आसक्त लोग ही मानते हैं। देखो, कब तक यूँ जी पाती हूँ। आजकल बड़े-बूढों की वैसे भी कोई इज्जत नहीं रह गयी है। "बच्चो! तुम अपने काम में लगो। आते रहना, मेरे हाल-चाल लेते रहना। मुझे लगेगा कोई तो है मुझसे बात करने वाला।"
कल्लोमाई से विदा लेकर पटरीरानी रेलबाला के साथ आगे बढ़ गयी।
शेष भाग अगले अंक में...

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