मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बरगद शाखी

सड़क किनारे लगे बिजली के पोल ने निराश खड़े बिना नाम वाले पेड़ को कहा — "भैया, उदास क्यों हो! तुम भी बरगद की तरह आदम समाज में सम्मान पा सकते हो. इसके लिए तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ. समाज में ऐसे कई वृक्ष हैं जो महान होने और वरिष्ठता का ढ़ोंग करते हैं. तुम भी वैसा ही क्यों नहीं करते? तुम एक शाखा सड़क की ओर ऎसी निकालो जो सड़क के दूसरे छोर पर खड़े पोल के सम्यक और समान ऊँचाई पर बन पड़े. तब देखना बेनर लगाने वाले तुम्हें जल्दी ही वटवृक्षीय गरिमा प्रदान कर देंगें. भैया, ये विज्ञापन युग है. यहाँ सहजात और स्वाभाविक सौंदर्य मायने नहीं रखता. जितना लिपोगे पुतोगे, उतना ऊँचे जाओगे.

पेड़ ने कहा — भैया, वो कैसे? मैं वटवृक्ष की तरह कैसे दिख सकता हूँ? अगर दिखने भी लगूँ तो क्या आदम समाज मुझे वट मानेगा? पूजा करेगा?

पोल बोला — महीने दो महीने में देखना धडाधड बेनर लगेंगे, और हटेंगे-फटेंगे. उन सभी बैनरों की डोरियाँ तुम्हें वट बना देंगी. सड़क पर सोने वाले और प्रचार की प्रतिस्पर्धा में पड़े अपने लिए सही जगह ढूँढने वाले दोनों प्रकार के लोग इसमें सहयोग करेंगे. गरीबों को तन ढकने को कच्छा, कुर्ता, टॉयलेट के लिए पर्दा सब इसी कपड़े से मिलता है. चुनाव सर पर हैं तुम्हारी तो मोज ही मोज आने वाली है.

पेड़ ने कहा — अरे भैया, क्यों गरीब पेड़ का मज़ाक बनाते हो. आदमी बहुत समझदार प्राणी है. असली-नकली की उसे पहचान है. मेरा ये मुखोटा वह झट पहचान लेगा.

पोल बोला — आदम समाज धीरे-धीरे पेड़ों के नाम, उनकी असल पहचान को भूलता जा रहा है. उसे केवल रेपर नोलिज ही चाहिए. वह ज्ञान के नाम पर वस्तु और प्राणी आदि को कुछ विशेषताओं से ही काम चलाने लगा है. आदमी को आज केवल फल खाने से मतलब रह गया है, पेड़ गिनने से नहीं, और ना ही उसकी समस्याओं से उसको कोई लेना-देना है. तुम अपना वट बनो और सम्मान पाओ. कुछ दिनों में देखना भक्ति में अंधे हुए नयी पीढ़ी के लोग तुम्हारे चारों ओर चबूतरा बनायेंगे, मनौती का कलावा लपेटने लगेंगे. दीपक जलाएंगे, प्रसाद चिपकायेंगे, लटकती सुतलियों पर अपने अपूर्ण अरमानों की ग्रंथियाँ बांधते जायेंगे. तब तुम मुझे मत भूल जाना. क्योंकि तब तक मेरा होलिजन लाइट बल्ब फ्यूज़ होकर गिर चुका होगा. या, उसमें किसी कौवे ने घोंसला कर लिया होगा या, मरे पतंगों की भरमार से मेरा लाइटिंग कवर भर चुका होगा.
तुम शीघ्र बड़े और महान होने वाले हो, मुझे भूल मत जाना मेरे दोस्त.  आने वाले चुनाव का फायदा उठा लो. मौक़ा हाथ से गया तो जल्दी बरगद नहीं बन पाओगे. 

शेष अगले अंक में.
[मैंने अभी "तेल का कुआँ" रोका हुआ है.  जिसे मौक़ा मिलने पर बढाया जाएगा. ]

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