मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बरगद शाखी

सड़क किनारे लगे बिजली के पोल ने निराश खड़े बिना नाम वाले पेड़ को कहा — "भैया, उदास क्यों हो! तुम भी बरगद की तरह आदम समाज में सम्मान पा सकते हो. इसके लिए तुम्हें एक रहस्य की बात बताता हूँ. समाज में ऐसे कई वृक्ष हैं जो महान होने और वरिष्ठता का ढ़ोंग करते हैं. तुम भी वैसा ही क्यों नहीं करते? तुम एक शाखा सड़क की ओर ऎसी निकालो जो सड़क के दूसरे छोर पर खड़े पोल के सम्यक और समान ऊँचाई पर बन पड़े. तब देखना बेनर लगाने वाले तुम्हें जल्दी ही वटवृक्षीय गरिमा प्रदान कर देंगें. भैया, ये विज्ञापन युग है. यहाँ सहजात और स्वाभाविक सौंदर्य मायने नहीं रखता. जितना लिपोगे पुतोगे, उतना ऊँचे जाओगे.

पेड़ ने कहा — भैया, वो कैसे? मैं वटवृक्ष की तरह कैसे दिख सकता हूँ? अगर दिखने भी लगूँ तो क्या आदम समाज मुझे वट मानेगा? पूजा करेगा?

पोल बोला — महीने दो महीने में देखना धडाधड बेनर लगेंगे, और हटेंगे-फटेंगे. उन सभी बैनरों की डोरियाँ तुम्हें वट बना देंगी. सड़क पर सोने वाले और प्रचार की प्रतिस्पर्धा में पड़े अपने लिए सही जगह ढूँढने वाले दोनों प्रकार के लोग इसमें सहयोग करेंगे. गरीबों को तन ढकने को कच्छा, कुर्ता, टॉयलेट के लिए पर्दा सब इसी कपड़े से मिलता है. चुनाव सर पर हैं तुम्हारी तो मोज ही मोज आने वाली है.

पेड़ ने कहा — अरे भैया, क्यों गरीब पेड़ का मज़ाक बनाते हो. आदमी बहुत समझदार प्राणी है. असली-नकली की उसे पहचान है. मेरा ये मुखोटा वह झट पहचान लेगा.

पोल बोला — आदम समाज धीरे-धीरे पेड़ों के नाम, उनकी असल पहचान को भूलता जा रहा है. उसे केवल रेपर नोलिज ही चाहिए. वह ज्ञान के नाम पर वस्तु और प्राणी आदि को कुछ विशेषताओं से ही काम चलाने लगा है. आदमी को आज केवल फल खाने से मतलब रह गया है, पेड़ गिनने से नहीं, और ना ही उसकी समस्याओं से उसको कोई लेना-देना है. तुम अपना वट बनो और सम्मान पाओ. कुछ दिनों में देखना भक्ति में अंधे हुए नयी पीढ़ी के लोग तुम्हारे चारों ओर चबूतरा बनायेंगे, मनौती का कलावा लपेटने लगेंगे. दीपक जलाएंगे, प्रसाद चिपकायेंगे, लटकती सुतलियों पर अपने अपूर्ण अरमानों की ग्रंथियाँ बांधते जायेंगे. तब तुम मुझे मत भूल जाना. क्योंकि तब तक मेरा होलिजन लाइट बल्ब फ्यूज़ होकर गिर चुका होगा. या, उसमें किसी कौवे ने घोंसला कर लिया होगा या, मरे पतंगों की भरमार से मेरा लाइटिंग कवर भर चुका होगा.
तुम शीघ्र बड़े और महान होने वाले हो, मुझे भूल मत जाना मेरे दोस्त.  आने वाले चुनाव का फायदा उठा लो. मौक़ा हाथ से गया तो जल्दी बरगद नहीं बन पाओगे. 

शेष अगले अंक में.
[मैंने अभी "तेल का कुआँ" रोका हुआ है.  जिसे मौक़ा मिलने पर बढाया जाएगा. ]

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

तेल का कुआँ

डिगबोई प्रसाद एक तेल कुआँ था. प्रसाद जी हमेशा लबालब रहते. कोई 'तेल निकाल मजदूर'  उनके पास आता, बर्तन भरभर देते. प्रसाद जी का एक पाईपलाइन से गठबंधन हो चुका था. इससे वो बहुत खुश-खुश रहते. लेकिन गठबंधन के पहले वर्ष में ही लीकेज हुआ और पाईपलाइन फट गयी. तेल सप्लाई बंद करनी पड़ी. प्रसाद जी अकस्मात् टूटे बंधन से बहुत दुखी हुए. वियोग की ज्वाला से दग्ध होकर दिन-रात आँसू बहाते रहते.


प्रसाद जी को यूँ आँसू बहाता देख 'मिटटीशरण' नामक एक पुराने गहरे कुएँ ने कहा — प्यारे डिगबोई! तुम्हें व्यर्थ में इस तरह आँसू नहीं बहाने चाहिए. तेली कुएँ की तो कीचड़ भी कीमती होती है ये तो फिर भी आँसू है. इनसे क्यों नहीं तुम एक काव्य की रचना कर डालते. दुःख के इन अन्तरंग भावों को पुंजीभूत कर एक नयी सप्लाई क्यों नहीं देते. जैसे तुम कह सकते हो — "जो सटी कूप नलिका थी/ बिलकुल अन्दर तक आयी/ किल्लत में फट जाने पर/ हो गयी बंद सप्लाई."


प्रसाद जी को जैसे दिशा मिल गयी. मन पुनः नवीन उमंग से तरंगित हो उठा. मन के तैलीय मवाद को डिगबोई ने कुछ 'तैल-काव्य' प्रस्फुटित करने के बाद अपने को शांत अनुभूत किया.


इस तेल भरे कुएँ में
अब नलिका नहीं उतरती
तरबतर तेल से तो भी
प्यासी लगती हैं धरती.


आती है रिक्त कुएँ से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती झन्नाती-सी
पगली-सी देती फेरी.


भर-भरकर सारे भाण्डे
पी-पीकर प्यारी नलिका
आ-आकर चूसे जाती
दिखला यौवन की कलिका.


दो दर्पण हुए परस्पर
करते छाया-प्रतिछाया
हो गयी न जाने कितनी
उनके बिम्बों की जाया.


खैर, तैल-काव्य तो लंबा चला. बहरहाल डिगबोई प्रसाद जी काव्य रचनाकर्म से संतुष्ट नहीं हुए. मानव रुपी विधाता की इच्छा ने उनका पुनःगठबंधन एक नवीन पाइपलाइन से कर दिया. सप्लाई पुनः प्रारम्भ हो गयी. 


शेष अगले अंक में...

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

हमारी आवाज सुनले बेटा!

http://chitthajagat.in/अब आगे...

रेलबाला जब आगे बढती है तभी उसे अपनी ओर २५-२६ साल का एक युवक आता दिखाई देता है. युवक रेलबाला पर आकर लेट गया और तनाव में काफी देर तक बडबडाता रहा. चेहरे से परेशान दिखने वाला युवक आँसू बहाता रहा. तब रेलबाला ने कहा — "बेटा, इस तरह क्यों जान गँवाता है, जा घर जा. तू जीते जी माँ को मार डालेगा. तेरे कष्टों की पीड़ा ऐसे हल ना होगी. जीकर तो देख, जीवन में आयी कष्टकर परिस्थितियाँ क्या जीवनपर्यंत चलने वाली हैं, नहीं, बिलकुल नहीं, ये दुःख आना-जाना है. सुख की प्रतीक्षा तो कर. कभी तो दुःख का बादल दूर भागेगा. प्यारे! तुझसे लाखों अपेक्षाएँ होंगी. माँ की, पिता की, बहनों की, मित्रों की. संघर्ष की इस विकट परिस्थितियों में अगर तुम डूब गए तो ना जाने कितनों को मानसिक घात लगेगा. जितने लोग तुम्हारे जन्म के समय प्रसन्न हुए होंगे उससे कहीं अधिक लोग व्यथित होंगे. अब जल्दी उठ जा बेटा, ट्रेन आने का समय हो गया है. सिग्नल बदलने वाला है. बेटा, मानजा मेरी बात, माँ की गोदी में बच्चा बनकर लेट जाना. तनाव समाप्त हो जाएगा."

युवक फिर भी पडा-पडा आँसू बहाता रहा. एक शब्द हलक से नहीं निकला, कंठ रुद्ध हो गया. [विधाता ने शायद मनुष्यों को वो कान ही नहीं दिए जो प्रकृति के इन ममत्व से भरपूर दिलासों को सुन पायें.]

पटरीरानी बोलती है — बेटा, मैं जानती हूँ, तेरा दुःख, तुझे महीनों से नौकरी नहीं मिली और दोस्तों का उधार भी बढ़ गया है. एक मालिक ने तुझे वेतन नहीं दिया जिसकी तुझे आशा थी, जो तुझे माँ के पास भेजना था. अब वही आखिरी उम्मीद भी तेरी टूट गयी. बेटा, यूँ हिम्मत ना हार. हमारी आवाज सुनले बेटा!

पटरीरानी और रेलबाला समझाती रह गयीं. लेकिन तीव्र गति से आती हुयी सरकार की नयी दुरंतो ने उसे प्रकृति का स्वर सुनने की शक्ति प्रदान कर दी.  "हे राम"

"राम नाम सत्य है"

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

रिक्शा क़ानून क्यों तोड़ता है...

अब आगे...

जब वे दोनों फाटक प्रहरियों के पास से गुजरीं जहाँ उन्हें गले मिलती एक सड़क ने रोका. दोनों फाटक प्रहरी अपने दोनों ओर गाड़ियों को रोके खड़े थे. लेकिन कुछ कार वाले अपने आगे खड़े रिक्शे वालों को बुराभला कहते धमका रहे थे. रेलबाला ने एक कार में से आती आवाज सुनी —
"अबे हट बिहारी, अपना एरोप्लेन हटा."
रिक्शेवाला बोला — "साहब आगे फाटक बंद है. थोड़ा धीरज रखिये."
कार से आवाज आयी — "सान्नू धीरज दा पाठ सिखाएगा. तू शिक्षामंत्री है. हट जा (अपशब्द!) नहीं तो पोस्टर बना दूंगा. मैंन्नू जल्दी है, फ़ालतू की गल ना कर."
रिक्शे वाले के रिक्शे पहिये की कुछ तारें जब टूट गयीं तब दर्द के मारे रिक्शा फाटक के नीचे से निकलने लगा.  रेलबाला चिल्लायी — देख पटरी बहन, ये क्या कर रहा है, अभी ट्रेन आने वाली है और ये रिक्शा अपनी जान जोखिम में डाल रहा है.
पटरीरानी बोली — ये बिहारी इन हालातों में ही नियम तोड़ते हैं और गवर्नरी गुरूर पाले ओवरब्रिज बोलते हैं कि ये बिहारी नियम तोड़ने में अपनी शान समझते हैं. क्या इसी तरह के कुछ दूसरे प्रान्तों से सम्बंधित सूत्रवाक्य नहीं बनने चाहिए?
रेलबाला बोली — बहन तुझ पर गाडी आ रही है, ज़रा अपने नट-बोल्ट सहित तैयार होकर उसे अगले स्टेशन तक सुरक्षित पहुँचाओ.
कुछ देर तक धडाधड आवाज करती एक जनशताब्दी गुजर जाती है. फाटक प्रहरियों के डंडा हटाने से पहले ही रेलबाला और पटरीरानी आगे बढ़ जाती हैं क्योंकि वहाँ रोजाना की तरह प्रांतवाद वाली गालियों की बौछार होने वाली थी.

[शेष अगले अंक में ....]

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

कल्लोमाई को पहचानो

पटरी रानी की बात अब आगे...

"इन गवर्नर साहब से अच्छी तो बस्ती की गलियाँ हैं जिनमें लगी घूरे की ढेरियाँ ऊपर ही दिख जाती हैं और रास्ता भी बनाए रखती हैं। वहाँ तो केवल मच्छर पनपते हैं जो बीमारी फैलाते हैं लेकिन इन पढ़े लिखे सभ्य शहरी मार्गों ने तो पर्यावरण को जो घाव दिए हैं, वो भरने बेहद मुश्किल हो गए हैं। इनसे त्रस्त शोषित तो अपने नासूरों को देख-देखकर आत्महत्या करने की सोचने लगे हैं। चल, तुझे मैं कल्लोमाई से मिलाती हूँ जो कभी गोरी-चिट्टी हुआ करती थी। इन्हीं कल्चर्ड सिटिजन के संपर्क में आकर कोढ़ से ग्रस्त हो गयी। और आज एक कोढ़ी का जीवन जीने को विवश है।"
पटरीरानी और रेलबाला को अपनी-अपनी सड़कों के सिग्नल हरे दिखाई दिए। तभी धडा-धड़ करती दो गाड़ियां निकल गयीं। रेलबाला ने कहा — बहन, ये जो गाड़ियाँ अभी-अभी गयी हैं तुझे मालुम है इनमें एक गरीब रथ था जो गरीब जनता के लिए वातानुकूलित सुविधा के साथ कम किराए में यात्रा कराता है। इसमें प्रायः उन ग़रीबों का आना-जाना है जो अपनी अमीरी में गरीब हैं जिनका आरक्षण गरीबी की बिना जाँच-पड़ताल हुए हो जाता है। चलो कोई बात नहीं। ग़रीबों की जाति की एक ट्रेन तो चली। वरना, दिल्ली में तो गरीब जाति को ही हटाने की मुहीम ज़ारी है।
दूसरी गाडी मालगाड़ी थी जिसमें जमशेदपुर से लोहा-लंगड़ दिल्ली आया है। यहाँ कितने ही किसानों की ज़मीन विकास के नाम पर ज़बरन अधिगृहित कर ली गयी लेकिन इन बड़े उद्योगपतियों का सीमेंट लोहा अधिगृहित नहीं किया जाता। उन्हें विकास कार्यों के समय भरपूर लाभ दिया जाता है। अधिगृहित जैसे कायदे क़ानून केवल गरीब किसान भाइयों के लिए बने हैं।
तभी रेलबाला ने कहा — पटरी बहन, तुम चलते-चलते मुझे इस नाले के पास क्यों ले आई।
पटरीरानी बोली — नहीं बाला, ये नाला नहीं यमुना नदी है। आजकल इसे सभी सड़कें और रास्ते कल्लोमाई कहते हैं। और अब यमुना नदी भी अपना पुराना नाम भूल गयी है। अब ये कल्लोमाई संबोधन पर ही सुनती है।
एक दिन मैंने ऊपर से जाते हुए इसे यमुना कहकर पुकारा तो चुपचाप रही, ध्यान ही नहीं दिया लेकिन तभी विकासमार्ग वाले लोकनायक सेतु ने इसे कल्लोमाई कहकर जोर से सूखे फूलों का गुच्छा फैंका तो इसने झट से सुनकर कहा — "बेटा, ऐसा मत करो, मेरा कोढ़ बढ़ गया है। खुजली होती है, बदबू उठने लगी है। तुम मेरा ईलाज करवा दो। कृपा होगी। अपने रखरखाव वाले ठेकेदार से बोलो मेरा भी उद्धार करे।"
बाला ! तब जाना मैंने इसके दुःख को। अरे, कुछ सालों पहले तक इसमें मैं अपनी शक्ल साफ़ देख पाती थी लेकिन अब तो मुझे मेरी शक्ल भी बदरंग दिखती है।
तभी पटरीरानी ने यमुना नदी को आवाज़ लगाई — कल्लोमाई, रामराम, कैसी हो।
कल्लोमाई — रामराम, बच्चों, 'कैसी हो' कहकर मेरा क्यों परिहास उडाती हो। देखती नहीं हो मेरी दशा। ये कोढ़, ये गंदगी, ये बदबू, अब तो मैं अपने भाई यम से मिलने का सोचने लगी हूँ। यहाँ के लोगों ने तो मेरी बेकदरी कर दी। अब यहाँ पर रहने की इच्छा नहीं रह गयी है। तुम बताओ, कैसी हो? तुम रात-दिन बहुत चिल्लाती हो, तुम्हारा शोर प्रशासन के कान तक पहुँचता या नहीं। पिछली बार तुम कह रही थी कि तुम्हारे नट-बोल्ट ढीले हो रहे हैं। क्या उन्हें बदला गया या नहीं?
पटरीरानी ने कहा — कुछ बदले तो गए हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं लगती। एक बरसात-धूप में ही जंगियाने लगे हैं। अपना काम चला रही हूँ। आप बताओ, तुम्हारे कोढ़ और खुजली में कुछ राहत है?
कल्लोमाई — अरे नहीं बच्चों! एक फूल लिपटे अखबार में ज़रूर पढ़ा था कि कुछ दिनों पहले कुछ प्रांत सरकारों ने मेरे ईलाज के लिए अभियान चलाने की बात ज़रूर की है लेकिन देखो ये कब होता है? संगम पर जाकर मुझे पता चला कि गंगा बहन की भी हालत मुझ जैसी होती जा रही है। सैकड़ों नालों ने हमारा हाल खराब कर दिया है। फैक्ट्रियों, कल-कारखानों से निकलता तेजाबी कचरा मेरे कोढ़ में खुजली बनकर आ रहा है। लेकिन आज भी कुछ मेरे भक्तगण मुझमें दुबकी लगाते हैं पर मुझसे उन्हें लाभ पहुंचाने के बदले खुजली जैसी बीमारियाँ लग जाती हैं। क्या करूँ न भक्त मानते हैं न पूँजी के आसक्त लोग ही मानते हैं। देखो, कब तक यूँ जी पाती हूँ। आजकल बड़े-बूढों की वैसे भी कोई इज्जत नहीं रह गयी है। "बच्चो! तुम अपने काम में लगो। आते रहना, मेरे हाल-चाल लेते रहना। मुझे लगेगा कोई तो है मुझसे बात करने वाला।"
कल्लोमाई से विदा लेकर पटरीरानी रेलबाला के साथ आगे बढ़ गयी।
शेष भाग अगले अंक में...

बुधवार, 31 मार्च 2010

तेजू भाई से मुलाक़ात

अब आगे ...

रास्ते में ओवरब्रिज, पुलिया नदी-नाले तो कई मिले लेकिन उन्हें तो दिल्ली के एक घमंडी ओवरब्रिज से मिलना था। दिल्ली शहर में घुसीं और तब देखे उन्होंने मेट्रो दीक्षित के जलवे और ओवर ब्रिजों का नज़ारा।

रेलबाला ने पटरीरानी को उस ओवरब्रिज से मिलवाया। नमस्ते हुई।

रेलबाला ने कहा — ये तेजू भाई हैं, इन के कारण यातायात की गति तेज़ हो गयी इसलिए सभी इन्हें तेजू खन्ना कहते हैं। और तेजू भाई, ये मेरी सहेली है, आपको जानती नहीं थी सो मिलवाने ले आयी।

तेजू खन्ना बोले — ए! तुम मुझे भैया-वैया मत कहो। मैं तुमसे पहले भी मना कर चुका हूँ। मैं दिल्ली की जानी-मानी हस्ती हूँ। मैं समस्त दिल्ली की सड़कों का प्रमुख हूँ। मेरी हैसियत गवर्नर से कम नहीं। कोई बिहारी-शियारी या पुरबिया-शुरबिया होता तो मैं "आम रास्ता नहीं का बोर्ड लगाकर" लात मारके बाहर करता। क्योंकि तुम ब्यूटीफुल हो इसलिए बात कर रहा हूँ। तुम मुझे मिस्टर तेजू ब्रिज कह सकती हो।

तुहें मालूम है — दिल्ली में बस दुर्घटनाएँ क्यों हुईं? इन नोर्थ इंडियंस सड़कों और राजमार्गों ने दिल्ली में घुसकर नियमों का पालन नहीं किया। जगह-जगह क़ानून तोड़े। जहाँ मन आया वहाँ से निकल पड़े और शहरी मार्गों से मिल गए। इनके कारण हमारी यातायात व्यवस्था बिगड़ गयी। एक्सीडेंट बड़े। हादसे हुए। लोग मरे। इल्जाम हम पर आया।

मैं तो कहता हूँ कि 'दिल्ली' देश की ऎसी राजधानी हो जिसकी सड़कों के किनारे मॉल हों, बिजनिस कॉम्प्लेक्स हों। चमाचम लाईटिंग हो। सब्जी मंडियाँ और लेबर चौक जाने वाले रास्तों की ओर सड़कें न जुडी हों।

ब्रिज हों तो अपार्टमेंट्स से, मॉलों से जुड़े। या, ओफिसिज़ कि ओर खुले। पब्लिक स्कूलों की ओर मुँह किये या पिकनिक स्पोटों की ओर बाँह फैलाए। कुछ दिनों में देखना मैं इन ऐरे-गेरे राह चलते रास्तों का दिल्ली में घुसना बंद कर दूँगा। हर रास्ते पर अपना आई कार्ड होगा, साइन बोर्ड होगा। जिन पर नहीं होगा, मिटा दिए जायेंगे।

पटरीरानी सुनकर तिलमिला गयी। बोली — मैं सब जानती हूँ। कौन क़ानून तोड़ता है। जहां फ़ायदा देखा नहीं उसी के हो लिए। क्या मैं जानती नहीं। शहर की सड़कें जितनी अपने को सभ्य कहती हैं उनके भीतर कितने गटर, कितनी नालियाँ बहती हैं। और सबके सब कहाँ जाते हैं, किसे गंदा करते हैं। मुझसे तो नहीं छिपा। बेशक तुम अपने को पौश या संभ्रांत कहो लेकिन तुम जैसे कितनों ही के कारण भूजल की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है, बारिश भी होती है तो बाढ़ का कारण बनती है। जहाँ पानी कि ज़रुरत है वहां पानी जाता नहीं। भूजल स्तर नीचे और नीचे आता जा रहा है। उसपर तुम रैनी वैल की बात करके हल निकाल लेने की बात करते हो। तुम एक तरफ तो पर्यावरण हितैषी बनते हो दूसरी तरफ तुम जैसों के ही कारण देश के साफ़-सुथरे पर्यावरण में पान्त्वाद का प्रदूषण फ़ैल रहा है। मैं सब जानती हूँ — इन दिनों कितने पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं। मेट्रो-सिटी बनाने का नाम पर क्या खेल खेला जा रहा है, क्या मैं जानती नहीं। तुम केवल यहाँ पर गाडी कि जगह गड्डी चलाने के हिमायती हो। आने वाले सालों में देश-विदेश कि सड़कों की कबड्डी करवानी है इसलिए इन्हें छोटी-छोटी सड़कों, पगडंडियों और देहाती रास्तों को मिटाने की सूझी। इनसे इनकी इज्ज़त खराब हो रही है। मालूम होना चाहिए कि बड़ी सड़कें तब तक ही बड़ी हैं जब तक छोटी सड़कों और पगडंडियों का वजूद है। तुम घमंड से इतना फूल चुके हो कि धरती के अन्दर पड़ रही दरारों को नहीं देख पाते। कभी चरमराकर गिरोगे तब होश ठिकाने आयेंगे। बनावटी सड़कें, पुल, मॉल सब एक साथ बोलेंगे (नष्ट होंगे) और अपने देसी रास्ते ही तुम्हे राह दिखाएँगे। चल बाला! इस घमंडी की कारिस्तानी से दुखी नदी से तुझे मिलाती हूँ। तब करना इस पर्यावरण प्रेमी से दोस्ती।

शेष अगले अंक में....

रविवार, 28 मार्च 2010

लोहे की सड़क

एक गाँव के किनारे गेहूँ और धान के खेतों से होती हुई दो लम्बी लोहे की सड़क जाती थीं। एक का नाम था — पटरीरानी, दूसरी का नाम था — रेलबाला। उन दोनों सड़कों पर प्रतिदिन कई गाड़ियां आती-जाती थीं। गाड़ियां जब भी उन सड़कों पर आतीं, तो भागती चली जातीं।

एक बार पटरीरानी ने रेलबाला से कहा — बहन सुना है दिल्ली शहर में "मेट्रो" दीक्षित-हिरोइन बनकर अपनी चकाचौंध से सबका दिल जीत रही है। उसके लिए तो काफी धन खर्च किया जा रहा है। उसके रहने के लिए आलीशान, शानदार यार्ड-व्यवस्था हो चुकी है, घूमने-फिरने के लिए खूबसूरत बहनों का संग है। लेकिन हमारी बुरी दशा पर किसी किसी ने विचार नहीं किया, किसी को ममता नहीं आई।

रेलबाला ने पटरीरानी से कहा — हमें तो मुंबई की बार बालाओं की तरह समझ रखा है। कभी भी कोई भी आकर हमें बुराभला कह जाता है। ज़रा सोचो, क्या सच में हमारा जीवन उन बालाओं की तरह नहीं है जिनकी नग्नता 'अश्लीलता की हद' कहकर प्रतिबंधित कर दी जाती है; जेल में, सुधार-गृहों में भेज दी जाती है। दूसरी तरफ इन फिल्मी हीरोइनों की नग्नता कला की मांग कहकर सराही जाती है, फिल्मफेयर अवार्ड पाती है, जिसे सभ्य समाज आत्मसात करता रहा है। इन दोहरे मापदंडों से मुझे काफी चिढ है, खीज है। इस चिढ़ और खीज से मेरा गुस्सा कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि मुझसे लापरवाही हो जाती है और रेलदुर्घटनाएं हो जाती हैं। मुझे लगता है कि बार बालाओं को भी ऎसी खीज होती होगी जिसके कारण उनमे अपराध मानसिकता पनपती है, गुनाह होते हैं, अच्छे-भले घर बिगड़ते हैं।

पटरीरानी बोली — सच कहा बहन, ऎसी भेदभावपूर्ण नीति से तो मन खट्टा हो जाता है और उखड़ने का मन करता है। लेकिन इन बढ़ती दुर्घटनाओं को देखते हुए कोशीश करती हूँ कि जगी रहूँ और अपनी क्षमता से अधिक इन गाड़ियों को सुरक्षित पहुंचाती रहूँ।

रेलबाला ने कहा — हमारे हिस्से का पैसा जब तक हम पर पूरी तरह खर्च नहीं किया जाएगा तब तक हम कैसे जगी रह सकती हैं। बहन चलो, बाद में बात करूंगी, सामने का सिग्नल हरा हो गया है। ट्रेन आने वाली है। उसे सुरक्षित दूसरे स्टेशन तक पहुंचा दूँ। थोड़ी देर में मैं तुझे एक घमंडी ओवरब्रिज से मिलवाने ले चलूंगी।

पटरीरानी बोली — ठीक है, लगता है मेरा भी सिग्नल हरा हो गया, कुछ देर में मुझ पर भी गाड़ी आने वाली है, मैं ज़रा अपने नट-बोल्ट ठीक-ठाक करके तैयार हो जाऊं।

तभी दोनों तरफ से दौडती-भागती गाडिया आने-जाने लगीं। इतना शोर हुआ कि बेचारी दोनों सड़कों की जान निकलने लगी। अभी ना जाने कितनी ऎसी गाड़ियाँ आने वाली थीं।

दोनों ही अपने नट-बोल्टों कि छोटी-छोटी दरारों को बार-बालाओं की चोट समझकर मिट्टी और धूल से भरकर हँसते हुए ओवरब्रिज से मिलने चल दीं।

शेष अगले अंक में...

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

दो शब्द

प्रारम्भ से ही मेरी इच्छा कम बोलने वाले और चुपचाप रहने वाले साथियों से संवाद की रही। धीरे-धीरे यही इच्छा संकोचवश कविता लेखन के दौरान काल्पनिक कथोपकथन के रूप में विकसित हो चली। इसके बाद अर्थोपार्जन के समय व्यावसायिक अनवरतता न रहने से, रुचि व योग्यतानुरूप रोज़गार न मिलने से, ब्रेकेबल सर्विसेज़ के लम्बे ब्रेक काल में मानसिक तनाव से मुक्ति पाने को 'स्वगत कथन' की इच्छा प्रकृति की गोद में जा बैठी। फिर यही इच्छा पेड़-पौधों, पोखर-नदियों, रास्तों, पुल, बाँध पर्वत, मिट्टी... आदि सभी मूक जड़ वस्तुयों से पागलपने की हद तक बात करके सुख पाने लगी। उनमें मानवीय चरित्रों की परिकल्पना करने लगी, उनके कम्पन, उनके ठहराव, उनकी क्रियाओं, उनके परिवर्तनशील रूपों का व्याकरण अनुमानित करने लगी।

काफी समय से इन्हीं सबका पुंजीभूत रूप पुस्तकाकार रूप लेने को आतुर था। और आज वह आतुरता उन सब इच्छाओं को कहानी रूप में इंटरनेटीय ब्लॉग के ज़रिये आपके मोनिटर पर लाने में कुछ विराम पाती है। इसके लिए आभार उन परिस्थितियों और परिवेश का जिसमें कहानी पात्रों के सम्बन्ध में विस्तार से लगातार चिंतन का क्रम बनाए रखा। इनमे दो स्थितियां आज भी योगदान दे रहीं हैं - पहली, चार्टर्ड बस में खिड़कीवाली पिछली सीट जहां ऑफिस आते जाते प्रकृति चिंतन बिना व्यवधान हो जाता है। और दूसरी, कार्यालय में चिंतन की उड़ान भरने का भरपूर अवसर।

अपनी प्रियंवदा का सहयोग और उत्साह वर्धन के बिना इस ब्लॉग को शुरू करना संभव नहीं था। इसके लिए उन्हें ब्लोगर धर्म के नाते धन्यवाद देता हूँ।

आज २७ मार्च २०१०, दिन शनिवार को मैं संकल्प करता हूँ कि जब भी अवकाश मिलेगा "राम कहानी" में कोई-ना-कोई कहानी अवश्य जोडूंगा।

http://raamkahaani.blogspot.com/

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