रविवार, 28 मार्च 2010

लोहे की सड़क

एक गाँव के किनारे गेहूँ और धान के खेतों से होती हुई दो लम्बी लोहे की सड़क जाती थीं। एक का नाम था — पटरीरानी, दूसरी का नाम था — रेलबाला। उन दोनों सड़कों पर प्रतिदिन कई गाड़ियां आती-जाती थीं। गाड़ियां जब भी उन सड़कों पर आतीं, तो भागती चली जातीं।

एक बार पटरीरानी ने रेलबाला से कहा — बहन सुना है दिल्ली शहर में "मेट्रो" दीक्षित-हिरोइन बनकर अपनी चकाचौंध से सबका दिल जीत रही है। उसके लिए तो काफी धन खर्च किया जा रहा है। उसके रहने के लिए आलीशान, शानदार यार्ड-व्यवस्था हो चुकी है, घूमने-फिरने के लिए खूबसूरत बहनों का संग है। लेकिन हमारी बुरी दशा पर किसी किसी ने विचार नहीं किया, किसी को ममता नहीं आई।

रेलबाला ने पटरीरानी से कहा — हमें तो मुंबई की बार बालाओं की तरह समझ रखा है। कभी भी कोई भी आकर हमें बुराभला कह जाता है। ज़रा सोचो, क्या सच में हमारा जीवन उन बालाओं की तरह नहीं है जिनकी नग्नता 'अश्लीलता की हद' कहकर प्रतिबंधित कर दी जाती है; जेल में, सुधार-गृहों में भेज दी जाती है। दूसरी तरफ इन फिल्मी हीरोइनों की नग्नता कला की मांग कहकर सराही जाती है, फिल्मफेयर अवार्ड पाती है, जिसे सभ्य समाज आत्मसात करता रहा है। इन दोहरे मापदंडों से मुझे काफी चिढ है, खीज है। इस चिढ़ और खीज से मेरा गुस्सा कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि मुझसे लापरवाही हो जाती है और रेलदुर्घटनाएं हो जाती हैं। मुझे लगता है कि बार बालाओं को भी ऎसी खीज होती होगी जिसके कारण उनमे अपराध मानसिकता पनपती है, गुनाह होते हैं, अच्छे-भले घर बिगड़ते हैं।

पटरीरानी बोली — सच कहा बहन, ऎसी भेदभावपूर्ण नीति से तो मन खट्टा हो जाता है और उखड़ने का मन करता है। लेकिन इन बढ़ती दुर्घटनाओं को देखते हुए कोशीश करती हूँ कि जगी रहूँ और अपनी क्षमता से अधिक इन गाड़ियों को सुरक्षित पहुंचाती रहूँ।

रेलबाला ने कहा — हमारे हिस्से का पैसा जब तक हम पर पूरी तरह खर्च नहीं किया जाएगा तब तक हम कैसे जगी रह सकती हैं। बहन चलो, बाद में बात करूंगी, सामने का सिग्नल हरा हो गया है। ट्रेन आने वाली है। उसे सुरक्षित दूसरे स्टेशन तक पहुंचा दूँ। थोड़ी देर में मैं तुझे एक घमंडी ओवरब्रिज से मिलवाने ले चलूंगी।

पटरीरानी बोली — ठीक है, लगता है मेरा भी सिग्नल हरा हो गया, कुछ देर में मुझ पर भी गाड़ी आने वाली है, मैं ज़रा अपने नट-बोल्ट ठीक-ठाक करके तैयार हो जाऊं।

तभी दोनों तरफ से दौडती-भागती गाडिया आने-जाने लगीं। इतना शोर हुआ कि बेचारी दोनों सड़कों की जान निकलने लगी। अभी ना जाने कितनी ऎसी गाड़ियाँ आने वाली थीं।

दोनों ही अपने नट-बोल्टों कि छोटी-छोटी दरारों को बार-बालाओं की चोट समझकर मिट्टी और धूल से भरकर हँसते हुए ओवरब्रिज से मिलने चल दीं।

शेष अगले अंक में...

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

दो शब्द

प्रारम्भ से ही मेरी इच्छा कम बोलने वाले और चुपचाप रहने वाले साथियों से संवाद की रही। धीरे-धीरे यही इच्छा संकोचवश कविता लेखन के दौरान काल्पनिक कथोपकथन के रूप में विकसित हो चली। इसके बाद अर्थोपार्जन के समय व्यावसायिक अनवरतता न रहने से, रुचि व योग्यतानुरूप रोज़गार न मिलने से, ब्रेकेबल सर्विसेज़ के लम्बे ब्रेक काल में मानसिक तनाव से मुक्ति पाने को 'स्वगत कथन' की इच्छा प्रकृति की गोद में जा बैठी। फिर यही इच्छा पेड़-पौधों, पोखर-नदियों, रास्तों, पुल, बाँध पर्वत, मिट्टी... आदि सभी मूक जड़ वस्तुयों से पागलपने की हद तक बात करके सुख पाने लगी। उनमें मानवीय चरित्रों की परिकल्पना करने लगी, उनके कम्पन, उनके ठहराव, उनकी क्रियाओं, उनके परिवर्तनशील रूपों का व्याकरण अनुमानित करने लगी।

काफी समय से इन्हीं सबका पुंजीभूत रूप पुस्तकाकार रूप लेने को आतुर था। और आज वह आतुरता उन सब इच्छाओं को कहानी रूप में इंटरनेटीय ब्लॉग के ज़रिये आपके मोनिटर पर लाने में कुछ विराम पाती है। इसके लिए आभार उन परिस्थितियों और परिवेश का जिसमें कहानी पात्रों के सम्बन्ध में विस्तार से लगातार चिंतन का क्रम बनाए रखा। इनमे दो स्थितियां आज भी योगदान दे रहीं हैं - पहली, चार्टर्ड बस में खिड़कीवाली पिछली सीट जहां ऑफिस आते जाते प्रकृति चिंतन बिना व्यवधान हो जाता है। और दूसरी, कार्यालय में चिंतन की उड़ान भरने का भरपूर अवसर।

अपनी प्रियंवदा का सहयोग और उत्साह वर्धन के बिना इस ब्लॉग को शुरू करना संभव नहीं था। इसके लिए उन्हें ब्लोगर धर्म के नाते धन्यवाद देता हूँ।

आज २७ मार्च २०१०, दिन शनिवार को मैं संकल्प करता हूँ कि जब भी अवकाश मिलेगा "राम कहानी" में कोई-ना-कोई कहानी अवश्य जोडूंगा।

http://raamkahaani.blogspot.com/

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